सोने के भाव इन दिनों ₹1.43 लाख प्रति 10 ग्राम के आसपास बने हुए हैं, जिससे कई खरीदार ₹1 लाख तक की गिरावट का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि सेंट्रल बैंकों की लगातार खरीदारी के चलते इसमें जल्द बड़ी गिरावट की उम्मीद कम है। हालांकि, **5-15%** तक की छोटी गिरावट संभव है, लेकिन बड़ी गिरावट के लिए डॉलर का मजबूत होना या ब्याज दरों में बड़ी बढ़ोतरी जैसे बड़े ट्रिगर्स की जरूरत होगी।
Detailed Coverage
सोने के खरीदारों के लिए 'रुको और देखो' की स्थिति
भारतीय खरीदार फिलहाल सोने की ऊंची कीमतों का सामना कर रहे हैं, जहां सोना ₹1,43,000 प्रति 10 ग्राम के करीब ट्रेड कर रहा है। इस वजह से बहुत से लोग कीमतों में बड़ी गिरावट का इंतजार कर रहे हैं, खासकर ₹1 लाख से नीचे आने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। यह वो लेवल है जो अप्रैल 2025 में देखा गया था। हालांकि, मार्केट एक्सपर्ट्स और इंडस्ट्री बॉडीज का कहना है कि मौजूदा फंडामेंटल्स के हिसाब से इतनी बड़ी गिरावट फिलहाल संभव नहीं दिख रही है।
सेंट्रल बैंकों की खरीदारी से मजबूत सपोर्ट
विशेषज्ञों का मानना है कि सोने के भाव में बड़ी गिरावट की भविष्यवाणी न करने की मुख्य वजह है दुनिया भर के सेंट्रल बैंकों की लगातार खरीदारी। यह इंस्टीट्यूशनल बाइंग सोने के दामों को गिरने से रोकने में एक मजबूत सपोर्ट का काम करती है। Augmont जैसी फर्मों के एक्सपर्ट्स का कहना है कि सोने का ₹1 लाख तक वापस जाना एक बहुत ही कम संभावना वाला, एक्सट्रीम सिनेरियो है, न कि नज़दीकी भविष्य का कोई यथार्थवादी अनुमान। इसके बजाय, 2026 के बाकी समय के लिए सोने के भाव ₹1.4 लाख से ₹1.5 लाख प्रति 10 ग्राम के बीच रहने का अनुमान है। 5% से 15% तक की छोटी-मोटी उतार-चढ़ाव ही ज्यादा संभावित ट्रेंड है।
कीमतों में गिरावट के संभावित ट्रिगर्स
हालांकि कई लोग बड़ी गिरावट को असंभावित मानते हैं, कमोडिटी एनालिस्ट्स कुछ खास इकोनॉमिक ट्रिगर्स की ओर इशारा करते हैं जो अंततः कीमतों में एक महत्वपूर्ण सुधार ला सकते हैं। इनमें अमेरिकी डॉलर का मजबूत होना शामिल है, जो आमतौर पर सोने की कीमतों के विपरीत चलता है। इसके अलावा, अगर प्रमुख सेंट्रल बैंक आक्रामक तरीके से ब्याज दरें बढ़ाते हैं, तो सोने जैसी नॉन-यील्डिंग एसेट्स (जिन पर कोई ब्याज नहीं मिलता) का आकर्षण कम हो सकता है।
एनालिस्ट्स का यह भी कहना है कि सोने की कीमतों में गिरावट के लिए ग्लोबल रिस्क एपेटाइट (जोखिम लेने की भूख) में बदलाव की जरूरत होगी। अगर भू-राजनीतिक तनाव कम होते हैं और वैश्विक आर्थिक आउटलुक सुधरता है, तो निवेशक इक्विटी जैसी अधिक जोखिम वाली संपत्तियों की ओर अपना पैसा लगा सकते हैं, जिससे सोने की मांग कम हो सकती है। सेंट्रल बैंकों द्वारा सोने की खरीदारी में कमी, जो हाल की मूल्य वृद्धि का एक प्रमुख कारक रही है, वह भी उन लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण फैक्टर होगा जो लंबे समय तक गिरावट की उम्मीद कर रहे हैं।
निवेशकों के लिए सलाह
फिलहाल मार्केट सेंटीमेंट ग्लोबल इकोनॉमिक्स से परे भी कई फैक्टर्स से प्रभावित हो रहा है। भारत में हालिया सरकारी सलाह, जिसमें तुरंत बड़े पैमाने पर सोने की खरीदारी से बचने की बात कही गई है, साथ ही महंगाई का दबाव जो लोगों की बचत को प्रभावित कर रहा है, ने रिटेल खरीदारों के लिए एक सतर्क माहौल बना दिया है। लंबे समय के निवेशकों के लिए, मार्केट एनालिस्ट्स सलाह देते हैं कि वे पुरानी कीमतों पर लौटने की उम्मीद करने के बजाय 10-20% की गिरावट के दौरान धीरे-धीरे खरीदारी पर ध्यान केंद्रित करें। निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात सेंट्रल बैंक की खरीदारी के पैटर्न और वैश्विक ब्याज दरों के रास्ते पर नजर रखना होगा, क्योंकि यही आने वाले महीनों में कीमतों की दिशा तय करेंगे।
