मध्य-पूर्व तनाव और डॉलर की चाल ने सोने को किया धीमा
मध्य-पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और डॉलर की मजबूती के कारण 23 अप्रैल 2026 को ग्लोबल गोल्ड प्राइसेज में नरमी आई। सोना $4,705 प्रति औंस के आसपास कारोबार कर रहा था। स्टेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) की नाकेबंदी की खबरें, जो कि ग्लोबल तेल व्यापार का करीब 20-21% हिस्सा है, ऊर्जा सप्लाई और महंगाई को लेकर चिंताएं बढ़ा रही हैं। इन अनिश्चितताओं के चलते फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) की ब्याज दर में कटौती की उम्मीदों पर फिर से विचार हो रहा है। अमेरिकी डॉलर का मजबूत होना भी सोने पर अतिरिक्त दबाव बना रहा है। इस तनाव के शुरू होने के बाद से सोने की कीमतों में करीब 10-11% की गिरावट देखी गई है।
भारत में सोने का प्रीमियम अभी भी मजबूत
वैश्विक गिरावट के बावजूद, भारत में सोने की कीमतों ने दुबई की तुलना में अपना प्रीमियम बरकरार रखा। 23 अप्रैल 2026 को भारत में 24K सोने का भाव ₹151,990 प्रति 10 ग्राम था, जबकि दुबई में यह करीब AED 580.50 प्रति ग्राम या ₹116,000 प्रति 10 ग्राम था। यह ₹6,000-7,900 प्रति 10 ग्राम का अंतर, यानी 4% से अधिक का प्रीमियम, भारत की मजबूत घरेलू मांग और 6% की गोल्ड इंपोर्ट ड्यूटी (5% बेसिक कस्टम्स ड्यूटी + 1% एग्रीकल्चर इन्फ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट सेस) का नतीजा है। त्योहारों और शादी-ब्याह के मौसम में मजबूत मांग कीमतों को सहारा दे रही है।
गोल्ड ईटीएफ में रिकॉर्ड इनफ्लो
इस बीच, भारत में गोल्ड ईटीएफ (Gold ETFs) ने फाइनेंशियल ईयर 26 (FY26) में रिकॉर्ड ₹68,867 करोड़ का इनफ्लो देखा, जो पिछले साल की तुलना में 364% ज्यादा है। यह निवेश जियोपॉलिटिकल रिस्क और सुरक्षित निवेश की तलाश का संकेत है। ICICI Prudential Gold ETF और Nippon India Gold BeES जैसे लीडिंग गोल्ड ईटीएफ निवेशकों के बीच काफी लोकप्रिय हैं। कुल म्यूचुअल फंड इनफ्लो में ईटीएफ की हिस्सेदारी करीब 10% हो गई है।
सोने के लिए आगे क्या?
विश्लेषकों का अनुमान है कि निकट भविष्य में सोना $4,700 और $4,895 प्रति औंस के बीच रह सकता है। MCX गोल्ड जून फ्यूचर्स ₹150,000 से ₹152,400 प्रति 10 ग्राम के दायरे में कारोबार कर सकते हैं। लंबी अवधि में, Goldman Sachs जैसी फर्मों का अनुमान है कि सोना 2026 के अंत तक $5,400 प्रति औंस तक पहुंच सकता है, जो भारत में ₹1.7-1.9 लाख प्रति 10 ग्राम के बराबर होगा। हालांकि, तत्काल कीमत की चाल मध्य-पूर्व संघर्ष, फेडरल रिजर्व के फैसले और डॉलर की दिशा पर निर्भर करेगी।
