बाजार में आज सोने की चाल में बड़ा अंतर देखने को मिला। एक तरफ जहां भारत में सोने की कीमतें थोड़ी चढ़ीं, वहीं दूसरी तरफ ग्लोबल मार्केट में गिरावट दर्ज की गई। यह स्थिति गोल्ड के पारंपरिक 'सुरक्षित निवेश' (safe haven) वाली भूमिका पर सवाल खड़े करती है। आमतौर पर भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने पर सोना चढ़ता है, लेकिन इस बार महंगाई (inflation) और सेंट्रल बैंकों के फैसले सोने की दिशा तय कर रहे हैं।
सोने का 'बंटा हुआ' बाजार: भारत में तेजी, ग्लोबल में गिरावट
6 अप्रैल 2026 को भारतीय बाजारों में 24 कैरेट सोने का भाव ₹149,710 प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया। यह वृद्धि ग्लोबल स्पॉट गोल्ड की कीमतों के बिल्कुल उलट है, जो $4,676 प्रति औंस के आसपास आ गए हैं। हैरानी की बात यह है कि ईरान और हॉरमज़ जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ते तनाव के बावजूद, जो आमतौर पर सोने को सहारा देते हैं, कीमतें गिर रही हैं। यह असामान्य स्थिति बताती है कि मौजूदा आर्थिक हालात सोने की पारंपरिक सुरक्षित पनाह वाली चाल को दबा रहे हैं।
फेड रेट का डर, भू-राजनीतिक चिंताओं पर हावी
सोने की कीमतों में उछाल के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा महंगाई और अमेरिकी फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) की मॉनेटरी पॉलिसी को लेकर चिंताएं हैं। हालिया अमेरिकी आंकड़ों से संकेत मिलता है कि मार्च 2026 में हेडलाइन CPI में 3.25% की मासिक बढ़ोतरी हो सकती है, जबकि सालाना आंकड़े 3.71% तक पहुंचने की उम्मीद है, जिसका मुख्य कारण ऊर्जा की कीमतें हैं। इस महंगाई के दबाव और मजबूत लेबर मार्केट के चलते, मार्केट ने 2026 में फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदें काफी कम कर दी हैं। फेड ने अपनी टारगेट रेट 3.50%-3.75% पर ही रखी है, और फ्यूचर्स मार्केट यह दिखा रहे हैं कि इस साल कोई कटौती होने की संभावना नहीं है।
अमेरिकी डॉलर की मजबूती और सोने पर असर
इस सख्त मॉनेटरी पॉलिसी का सीधा असर अमेरिकी डॉलर (US dollar) पर पड़ रहा है, जो मजबूत हो रहा है। डॉलर इंडेक्स DXY 100 के पार चला गया है। 6 अप्रैल 2026 को डॉलर 100.1333 पर कारोबार कर रहा था। ऐसे में, सोना, जो कोई डिविडेंड या ब्याज नहीं देता, निवेशकों के लिए कम आकर्षक हो जाता है, क्योंकि उन्हें कहीं और ज्यादा रिटर्न मिल रहा है। डॉलर की यह मजबूती सोने की कीमतों में किसी भी बड़ी तेजी को सीमित कर रही है।
भारत की मांग और सरकारी इम्पोर्ट कर्ब्स
ग्लोबल दबावों के बावजूद, भारतीय सोने की कीमतों में अभी भी दुबई की दरों से लगभग 10.34% का प्रीमियम बना हुआ है। यह मजबूत घरेलू मांग का संकेत हो सकता है। दरअसल, अप्रैल-फरवरी 2025-26 के दौरान गोल्ड इम्पोर्ट में 28.7% की भारी बढ़ोतरी हुई थी, जिससे ट्रेड डेफिसिट बढ़ा था। ट्रेड डेफिसिट को मैनेज करने और संभावित दुरुपयोग को रोकने के लिए, भारत सरकार ने 2 अप्रैल 2026 को सोने के सभी आर्टिकल्स के इम्पोर्ट पर तत्काल प्रतिबंध लगा दिए। ये पाबंदियां, पिछली एग्रीमेंट्स के बावजूद, कीमती धातुओं के इनफ्लो को नियंत्रित करने के सरकारी के सक्रिय रुख को दर्शाती हैं। मौजूदा इम्पोर्ट ड्यूटी और 3% सेल्स टैक्स घरेलू कीमतों को प्रभावित कर रहे हैं।
सोना क्यों संघर्ष कर रहा है 'सुरक्षित निवेश' के तौर पर?
मार्केट का मौजूदा सेंटिमेंट यह दिखाता है कि सोना एक सुरक्षित पनाह (safe haven) के तौर पर संघर्ष कर रहा है। निवेशकों द्वारा अधिक वोलेटाइल या रिटर्न देने वाली एसेट्स में पैसा लगाने से इस पर बिकवाली का दबाव है। JP Morgan और Goldman Sachs जैसे विश्लेषकों ने 2026 के लिए $5,000-$6,300 का लॉन्ग-टर्म टारगेट बनाए रखा है, लेकिन वे शॉर्ट-टर्म में बड़े प्राइस मूवमेंट के जोखिम को भी स्वीकार करते हैं। मुख्य जोखिमों में लगातार बढ़ती महंगाई, सख्त मॉनेटरी पॉलिसी, मजबूत डॉलर और भू-राजनीतिक तनावों में कमी शामिल हैं। अगर महंगाई कम होती है और सेंट्रल बैंक ब्याज दरों में कटौती शुरू करते हैं, तभी सोना अपनी सुरक्षित पनाह वाली स्थिति वापस पा सकता है।
सोने का भविष्य: मिले-जुले संकेत
2026 के लिए सोने के आउटलुक पर विश्लेषकों की राय अभी भी पॉजिटिव है, JP Morgan साल के अंत तक $5,000/oz का अनुमान लगा रहा है। हालांकि, मौजूदा आर्थिक हालात के कारण तत्काल भविष्य अनिश्चित बना हुआ है। SPDR Gold Shares (GLD) जैसे गोल्ड ईटीएफ (ETF) ने साल-दर-तारीख (YTD) में लगभग 10.47% का रिटर्न दिया है, लेकिन पिछले 30 दिनों में 10.65% की गिरावट आई है। VanEck Gold Miners ETF (GDX) में भी ऐसा ही ट्रेंड दिखा है, YTD में 10.3% की बढ़त के बावजूद फरवरी के हाई से 20% गिरा है। ये ट्रेंड बताते हैं कि भले ही फंडामेंटल डिमांड मौजूद हो, मौजूदा मार्केट कंडीशन बड़ी रैलियों को मुश्किल बना रही हैं। अभी सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि बढ़ते भू-राजनीतिक घटनाक्रम, महंगाई और मॉनेटरी पॉलिसी के बीच कैसे संतुलन बनता है।