दरअसल, सोने की मौजूदा चाल पर कई फैक्टर एक साथ असर डाल रहे हैं, जो एक मिली-जुली तस्वीर पेश कर रहे हैं।
Fed के संकेत और ग्लोबल डिमांड की रफ्तार
अमेरिकी फेडरल रिजर्व के अफसरों की तरफ से मिलेजुले संकेत आ रहे हैं। Fed गवर्नर माइकल बैर ने कहा कि ब्याज दरें अभी लंबी अवधि तक ऊंची रह सकती हैं, जो आमतौर पर सोने के लिए अच्छा माना जाता है। वहीं, शिकागो Fed के प्रेसिडेंट ऑस्टन गुलसोबी ने संकेत दिया कि अगर महंगाई कंट्रोल में रही तो दरें कम हो सकती हैं। इतिहास बताता है कि Fed द्वारा रेट कट शुरू करने के 12 महीनों में सोना औसतन 11% तक बढ़ा है। लेकिन, मौजूदा बाजार की हालत कुछ और कह रही है। चीन में लूनर न्यू ईयर की छुट्टियों के कारण ग्लोबल ट्रेडिंग वॉल्यूम में भारी कमी आई है, जिससे मांग कमजोर पड़ी है। साथ ही, रूस-यूक्रेन शांति वार्ता जैसे भू-राजनीतिक तनाव में कमी आने से सोने की 'सेफ-हेवन' (सुरक्षित निवेश) वाली अपील भी कम हुई है।
भारत में क्यों है Dubai से ज्यादा महंगा?
खास बात यह है कि भारतीय सर्राफा बाजार में सोना, दुबई के मुकाबले 5.04% महंगा बिक रहा है। इसकी मुख्य वजह भारत में लगने वाली इंपोर्ट ड्यूटी (करीब 6%) और उसके ऊपर GST व लोकल मेकिंग चार्जेज हैं। हालांकि, 4 फरवरी 2026 को सोने की बेस इंपोर्ट प्राइस में करीब $50 प्रति 10 ग्राम की कमी की गई थी, जिससे कुछ राहत मिली है, लेकिन भारत में कुल लागत अभी भी ज्यादा है।
जानकारों का क्या है कहना?
बाजार विश्लेषकों का अनुमान है कि 2026 में सोना महंगा बना रहेगा। J.P. Morgan ने चौथी तिमाही तक सोने का औसत भाव $5,055/oz और Goldman Sachs ने साल के अंत तक $5,400/oz रहने का अनुमान लगाया है। UBS तो इससे भी आगे बढ़कर 2026 में $7,200/oz तक का लेवल देख रहा है। 2025 में ग्लोबल सोने की मांग 5,000 टन के पार निकल गई थी, जिसका मुख्य कारण भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच ETFs और बार/कॉइन में निवेश था, हालांकि रिकॉर्ड कीमतों के कारण ज्वैलरी की मांग घटी।
भारतीय निवेशक और रुपये का खेल
भारत में निवेशक Nippon India ETF Gold BeES, HDFC Gold ETF और SBI Gold ETF जैसे गोल्ड ETFs के जरिए सोना खरीद सकते हैं। भारतीय रुपये का प्रदर्शन भी सोने की कीमत पर असर डालता है; 2026 तक रुपये में कमजोरी की आशंका है, जो आमतौर पर INR टर्म्स में सोने की कीमतों को सपोर्ट करती है।
जोखिम और आगे का रास्ता
लेकिन, सब कुछ इतना गुलाबी नहीं है। अगर फेडरल रिजर्व ब्याज दरें कम करने में देरी करता है या महंगाई बढ़ती है, तो सोने की चमक फीकी पड़ सकती है। रूस-यूक्रेन की शांति पहल और मध्य पूर्व में तनाव कम होने से भी सोने की 'सेफ-हेवन' प्रॉपर्टी कमजोर होगी। भारत में दुबई से लगातार बना प्रीमियम खरीदारों के लिए लागत बढ़ाएगा और इंपोर्ट ड्यूटी व करेंसी के उतार-चढ़ाव का जोखिम भी बढ़ाएगा। यह भी ध्यान रखना अहम है कि कई बार रेट कट शुरू होने से ठीक पहले सोना गिरता है और रेट कट के बाद रिएक्शन उम्मीद से ज्यादा वोलेटाइल होता है।
फिलहाल, बाजार विश्लेषकों का मानना है कि ट्रेडिंग वॉल्यूम में कमी और मिले-जुले आर्थिक संकेतों के कारण सोना अगले कुछ समय तक एक दायरे में ही रह सकता है। निवेशक फेडरल रिजर्व की मीटिंग मिनट्स और प्रमुख अमेरिकी आर्थिक डेटा पर बारीक नजर रखेंगे। लंबी अवधि में, सेंट्रल बैंकों की खरीददारी और भू-राजनीतिक/आर्थिक अनिश्चितताओं से बचाव की चाहत सोने की मांग को सहारा देगी। हालांकि, लगातार रिकॉर्ड हाई कीमतों से खुदरा और ज्वैलरी की मांग, खासकर भारत जैसे प्राइस-सेंसिटिव बाजारों में, सीमित रह सकती है।