सोने के भाव रिकॉर्ड के करीब: नीतियों का टकराव और मजबूत मांग
12 फरवरी, 2026 का दिन भारतीय सोने के बाजार के लिए अहम रहा, जहाँ कीमतें ऐतिहासिक ऊंचाई के बहुत करीब बनी रहीं। इन कीमतों पर कई फैक्टर असर डाल रहे हैं। एक तरफ, अमेरिका के लेबर मार्केट से आए उम्मीद से बेहतर जनवरी के जॉब्स डेटा ने फेडरल रिजर्व (Fed) की ओर से ब्याज दरों में फौरन कटौती की संभावनाओं को कुछ हद तक कम कर दिया है। इससे अमेरिकी डॉलर मजबूत हुआ, जो आमतौर पर कीमती धातुओं, जैसे सोने, के लिए एक चुनौती होता है।
सेंट्रल बैंकों की खरीदारी और भू-राजनीतिक सुरक्षा कवच
हालांकि, कीमतों को नीचे जाने से रोकने वाले कई मजबूत कारण मौजूद हैं। दुनिया भर के सेंट्रल बैंक लगातार बड़ी मात्रा में सोना खरीद रहे हैं। अनुमान है कि 2026 में वे करीब 800 टन सोना खरीद सकते हैं, जो कि सालाना उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा है। यह सोने के लिए एक मजबूत, दीर्घकालिक डिमांड (मांग) का संकेत है। इसके साथ ही, लगातार बने हुए भू-राजनीतिक तनाव, खासकर अमेरिका और ईरान के बीच, सोने को एक सुरक्षित निवेश (safe-haven asset) का दर्जा दिला रहे हैं। मध्य पूर्व में किसी भी तरह की अशांति या अनिश्चितता निवेशकों को सोने की ओर खींचती है, ताकि वे संभावित संघर्ष या आर्थिक अस्थिरता से खुद को बचा सकें।
भारतीय प्रीमियम और चांदी की अस्थिरता
भारतीय खरीदारों के लिए एक बात चिंताजनक है - सोने की कीमतें दुबई जैसे अंतरराष्ट्रीय बाजारों की तुलना में 5.7% से 5.8% तक अधिक प्रीमियम पर चल रही हैं। यह अंतर स्थानीय टैक्स और इंपोर्ट ड्यूटी (आयात शुल्क) को छोड़कर भी बना हुआ है। यह भारतीय खरीदारों के लिए सोने को और महंगा बनाता है। वहीं, दूसरी ओर, चांदी की कीमतों में ज्यादा उतार-चढ़ाव देखा गया। डॉलर की मजबूती और फेड की रेट कट की उम्मीदों में बदलाव के कारण चांदी के भाव 1.7% से 3.2% तक गिर गए। चांदी में औद्योगिक मांग होने के बावजूद, इसका बाजार छोटा होने और कम लिक्विडिटी (तरलता) के कारण यह सोने की तुलना में कीमतों के बड़े झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील रहती है।
गिरावट की आशंका: पॉलिसी बदलाव और तनाव कम होने का जोखिम
बाजार के जानकारों का मानना है कि भले ही मौजूदा रुझान सकारात्मक दिख रहा हो, कुछ जोखिम भी मौजूद हैं। अगर फेडरल रिजर्व ऊंची ब्याज दरें बनाए रखता है, खासकर अगर महंगाई (inflation) उम्मीद से ज्यादा बनी रहती है (जिसका पता शुक्रवार को आने वाली CPI रिपोर्ट से चलेगा), तो सोने जैसे गैर-उपज वाले एसेट (non-yielding asset) की अपील कम हो सकती है। दूसरी ओर, अगर किसी भी तरह के भू-राजनीतिक तनाव में कमी आती है, खासकर अमेरिका-ईरान संबंधों में, तो सोने की सुरक्षित निवेश वाली मांग पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा, फेडरल रिजर्व में नेतृत्व परिवर्तन (चेयर पॉवेल का कार्यकाल मई 2026 में समाप्त हो रहा है) भी पॉलिसी में अनिश्चितता ला सकता है, जो सोने की चाल को प्रभावित कर सकता है।
भविष्य का नज़रिया: लगातार ऊपर जाने की क्षमता
इन सब के बावजूद, विश्लेषकों की लंबी अवधि की राय (long-term outlook) काफी सकारात्मक है। 2026 के अंत तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोने की कीमतें $6,100 से $6,700 प्रति औंस तक पहुंचने का अनुमान है। भारत में, घरेलू कीमतों के ₹1.5 लाख से ₹1.95 लाख प्रति 10 ग्राम तक जाने की उम्मीद है। यह तेजी सेंट्रल बैंकों की लगातार खरीदारी, गोल्ड ईटीएफ (Gold ETFs) में निवेशकों के बढ़ते निवेश और वैश्विक आर्थिक व भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के खिलाफ सोने की एक महत्वपूर्ण बचाव (hedge) के रूप में भूमिका बनाए रखने की उम्मीदों पर आधारित है।