टेक्निकल चार्ट्स पर तेजी के संकेत
MCX पर सोने के भावों में हालिया उछाल, जो ₹156,600 के स्तर तक पहुंचा है, यह मुख्य रूप से टेक्निकल कारणों से है, न कि एसेट की मांग में किसी बड़े बदलाव के कारण। 8-पीरियड और 21-पीरियड एक्सपोनेंशियल मूविंग एवरेज (Exponential Moving Averages) के बीच बुलिश क्रॉसओवर (Bullish Crossover) ने मोमेंटम ट्रेडर्स (Momentum Traders) को लॉन्ग पोजीशन लेने का संकेत दिया है। रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स (Relative Strength Index) करीब 57 के स्तर पर है, जो ओवरसोल्ड टेरिटरी (Oversold Territory) से बाहर निकलने का संकेत देता है, लेकिन अभी भी ओवरबॉट लेवल (Overbought Levels) से काफी दूर है। ये सभी इंडिकेटर्स बताते हैं कि मौजूदा प्राइस एक्शन मजबूत सपोर्ट लेवल के करीब खरीदारी के कारण हो रहा है, जिससे शॉर्ट-सेलर्स को नुकसान हो सकता है।
मैक्रो फैक्टर्स और ब्याज दरों का असर
हालांकि टेक्निकल सेटअप ₹157,200 के टारगेट की ओर इशारा कर रहा है, लेकिन बड़े आर्थिक परिदृश्य में अभी भी कई बाधाएं हैं। गोल्ड की कीमत पर रियल इंटरेस्ट रेट्स (Real Interest Rates) का दबाव बना हुआ है। पिछले रैली साइकल्स के विपरीत, जहां सोना करेंसी की कमजोरी के खिलाफ एक हेज (Hedge) के रूप में काम करता था, वहीं मौजूदा माहौल में सेंट्रल बैंकों की लिक्विडिटी टाइटनिंग (Liquidity Tightening) की बातों का सोने की कीमतों पर सीधा असर दिख रहा है। पिछले बारह महीनों के पैटर्न बताते हैं कि इस तरह की रिकवरी अक्सर ₹157,500 जैसे बड़े साइकोलॉजिकल रेजिस्टेंस लेवल से टकराकर रुक जाती है, जब तक कि ग्लोबल बॉन्ड यील्ड्स (Global Bond Yields) में अचानक गिरावट न आए।
मंदी के पीछे के कारण
'डिप्स पर खरीदने' (Buy on Dips) की रणनीति यह मानकर चलती है कि सपोर्ट लेवल मजबूत है, लेकिन यह उतना मजबूत नहीं हो सकता जितना दिखता है। ₹156,300 के आसपास का मौजूदा सपोर्ट स्ट्रक्चर कमजोर है; अगर उम्मीद से बेहतर आर्थिक डेटा के कारण लिक्विडिटी कम हो जाती है, तो इस लेवल के टूटने पर स्टॉप-लॉस ऑर्डर्स (Stop-loss Orders) ट्रिगर हो सकते हैं। इसके अलावा, कीमती धातुओं की अस्थिरता अक्सर फिजिकल डिमांड की कमी को छुपाती है। हालांकि MCX पर ट्रेडर्स टेक्निकल ब्रेकआउट पर ट्रेड कर रहे हैं, लेकिन फिजिकल मार्केट में किसी बड़े प्रीमियम का न होना यह बताता है कि यह रैली केवल स्पेक्युलेटिव फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स (Speculative Financial Products) तक सीमित है। यह गैप एक बड़े करेक्शन का जोखिम बढ़ाता है, खासकर अगर मोमेंटम बना नहीं रहता और रिटेल ट्रेडर्स लिक्विडिटी टाइटनिंग की असलियत को नजरअंदाज करते हैं।
