दिल्ली में सोने के भाव ₹3,000 प्रति 10 ग्राम बढ़कर ₹1.47 लाख पर पहुंच गए हैं। कमजोर अमेरिकी डॉलर और फेडरल रिजर्व की पॉलिसी में बदलाव की उम्मीदों ने सोने को सहारा दिया है। चांदी के भाव भी ₹5,000 प्रति किलोग्राम बढ़े हैं।
क्या हुआ?
राष्ट्रीय राजधानी में गुरुवार को सोने की कीमतों में तेज उछाल देखा गया। पीली धातु ₹3,000 बढ़कर ₹1,47,500 प्रति 10 ग्राम के स्तर पर पहुंच गई। इससे पहले के कारोबारी दिन में यह ₹1,44,500 पर बंद हुई थी। चांदी ने भी इसी तरह का ट्रेंड फॉलो किया और ₹5,000 प्रति किलोग्राम की बढ़त के साथ ₹2,40,000 पर कारोबार कर रही है। यह बढ़त पिछले दो दिनों की गिरावट के बाद आई है, जो बाजार की बदलती दिशा का संकेत दे रही है। यह तेजी घरेलू सप्लाई की कमी के बजाय बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय कारकों से प्रेरित है।
उछाल के पीछे के ग्लोबल कारण?
कीमतों में वृद्धि का मुख्य कारण ग्लोबल मार्केट में आई तेजी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोने के भाव करीब 1% बढ़कर $4,070 प्रति औंस पर पहुंच गए। मार्केट एनालिस्ट्स का कहना है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दरों को लेकर भविष्य के रुख में नरमी आई है। जब अमेरिकी सेंट्रल बैंक ब्याज दरों पर कम आक्रामक या 'हॉकिश' रवैया अपनाता है, तो यह अमेरिकी डॉलर और बॉन्ड जैसी ब्याज देने वाली संपत्तियों की अपील को कम कर देता है। सोना, जो कोई ब्याज नहीं देता, तब अधिक आकर्षक हो जाता है जब ब्याज दरों को लेकर उम्मीदें कम हो जाती हैं।
इसके अलावा, करेंसी में हुए उतार-चढ़ाव ने भी भूमिका निभाई है। बैंक ऑफ जापान के हस्तक्षेप के कारण जापानी येन में मजबूती देखी गई है। इससे अमेरिकी डॉलर इंडेक्स में थोड़ी गिरावट आई है। चूंकि दुनिया भर में सोने का भाव अमेरिकी डॉलर में तय होता है, इसलिए कमजोर डॉलर होने पर अन्य मुद्राओं वाले खरीदारों के लिए यह सस्ता हो जाता है, जिससे अक्सर वैश्विक मांग बढ़ती है और कीमतें ऊपर जाती हैं।
डॉलर और सोने का संबंध क्यों है अहम?
भारतीय निवेशकों के लिए, अमेरिकी डॉलर और सोने की कीमतों के बीच का संबंध बहुत महत्वपूर्ण है। भारत सोने का एक बड़ा आयातक है, इसलिए स्थानीय बाजार में कीमतें वैश्विक स्पॉट कीमतों और विनिमय दर से काफी प्रभावित होती हैं। जब डॉलर वैश्विक स्तर पर कमजोर होता है, तो यह आमतौर पर सोने की कीमतों के लिए एक सकारात्मक संकेत होता है। इसके विपरीत, यदि डॉलर मजबूत होता है, तो यह कीमती धातुओं पर दबाव डाल सकता है। इस कनेक्शन को समझना यह बताने में मदद करता है कि घरेलू कीमतें क्यों महत्वपूर्ण रूप से बढ़ सकती हैं, भले ही भौतिक बाजार को प्रभावित करने वाली कोई विशेष स्थानीय खबर न हो।
भू-राजनीतिक और आर्थिक जोखिम
सेंट्रल बैंक की नीतियों से परे, मार्केट पार्टिसिपेंट्स भू-राजनीतिक विकास को भी ध्यान में रख रहे हैं। दोहा में अमेरिका और ईरान के बीच राजनयिक वार्ता में प्रगति की हालिया रिपोर्टों ने बाजार की भावनाओं में जटिलता का एक नया स्तर जोड़ा है। सोने को अक्सर एक 'सुरक्षित-आश्रय' संपत्ति (safe-haven asset) के रूप में देखा जाता है, जिसका अर्थ है कि वैश्विक अनिश्चितता या भू-राजनीतिक तनाव के समय इसकी मांग अक्सर बढ़ जाती है। हालांकि, इसका मतलब यह भी है कि यदि राजनयिक तनाव कम होता है, तो सोने की कीमत में निर्मित 'भय प्रीमियम' (fear premium) कम हो सकता है।
निवेशक क्या ट्रैक करें?
बुल्लियन मार्केट पर नजर रखने वाले निवेशकों को आगामी अमेरिकी आर्थिक डेटा पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए, खासकर नॉन-फार्म पेरोल रिपोर्ट पर। यह डेटा अमेरिकी श्रम बाजार की ताकत में अंतर्दृष्टि प्रदान करता है, जो फेडरल रिजर्व के भविष्य के ब्याज दर निर्णयों को निर्देशित करने वाला एक प्रमुख कारक है। एक मजबूत श्रम बाजार सख्त नीतियों का कारण बन सकता है, जबकि एक कमजोर बाजार दरों को स्थिर या कम रख सकता है। उम्मीद है कि ये आर्थिक आंकड़े आने वाले सत्रों में सोने और चांदी दोनों की कीमतों में उतार-चढ़ाव लाएंगे। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (World Gold Council) भी इस बात पर प्रकाश डालता है कि ब्याज दर की उम्मीदें साल की दूसरी छमाही में सोने की कीमतों के लिए केंद्रीय विषय बनी रहेंगी।
