आयात में बढ़ोतरी से बढ़ा व्यापार घाटा
भारत की आर्थिक तस्वीर पर सोने के आयात में तेज वृद्धि का असर दिख रहा है। अप्रैल-फरवरी 2025-26 के दौरान, सोने का आयात पिछले साल के $53.52 अरब की तुलना में 28.73% बढ़कर $69 अरब हो गया। कीमती धातु की ऊंची वैश्विक कीमतों और लगातार मांग के चलते यह उछाल आया है, जिसने ग्यारह महीनों में मर्चेंडाइज Trade Deficit (व्यापार घाटा) को $310.60 अरब तक पहुंचा दिया है। कीमती धातुओं की ऊंची कीमतों के कारण घरेलू बाजारों में सोने की कीमतें ₹1,51,500 प्रति 10 ग्राम के आसपास बनी हुई हैं।
यह रुझान देश के Current Account Deficit (CAD - चालू खाता घाटा) को काफी खराब कर रहा है। हालाँकि आधिकारिक बयानों में कहा गया है कि CAD अभी भी नियंत्रण में है, हालिया विश्लेषणों में इसके बढ़ने की चेतावनी दी गई है। दिसंबर 2025 तिमाही में यह $13.2 अरब पर था। कीमती धातुओं का आयात ऐतिहासिक रूप से भारत के बाहरी संतुलन के लिए एक आवर्ती चिंता का विषय रहा है, जिसमें अकेले सोना अक्सर व्यापार असंतुलन का एक बड़ा हिस्सा होता है।
FTA के दुरुपयोग पर सरकार का हस्तक्षेप
इसी बीच, 2 अप्रैल, 2026 को भारतीय सरकार ने सोने, चांदी और प्लैटिनम की सभी प्रकार की वस्तुओं पर तत्काल प्रतिबंध लगा दिए। इस कदम का उद्देश्य Free Trade Agreement (FTA), खासकर भारत-आसियान संधि के दुरुपयोग को रोकना है। रिपोर्टों के अनुसार, व्यापारी शुल्क से बचने के लिए इन समझौतों का इस्तेमाल कर रहे थे। Directorate General of Foreign Trade (DGFT) ने कहा है कि ये प्रतिबंध सार्वभौमिक रूप से लागू होंगे और मौजूदा अनुबंधों व शिपमेंट पर भी असर डालेंगे। यह प्लैटिनम और चांदी के गहनों पर पहले लगाए गए प्रतिबंधों के बाद आया है, जो कीमती धातु आयात पर व्यापक सख्ती का संकेत देता है। सरकार का लक्ष्य घरेलू उद्योग की रक्षा करना और बढ़ते आयात बिल को नियंत्रित करना है, जो विदेशी मुद्रा भंडार और मुद्रा स्थिरता को प्रभावित करता है।
संरचनात्मक मांग की चुनौती
भारत में सोने की मजबूत मांग सांस्कृतिक परंपराओं, निवेश के पसंदीदा माध्यम और आर्थिक अनिश्चितताओं के खिलाफ बचाव (Hedge) के रूप में इसकी भूमिका से उपजी है। इस स्थिर मांग, जो सालाना लगभग 849 मीट्रिक टन की खपत करती है, भारत को चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना उपभोक्ता बनाती है। हालाँकि Gold ETFs (गोल्ड ईटीएफ) जैसे वित्तीय साधनों को बढ़ावा देने के प्रयास किए गए हैं, जिससे इनफ्लो में वृद्धि हुई है, लेकिन भौतिक सोने की बुनियादी जरूरत जारी है, जो आयात मांग को बढ़ाती है। सरकारों ने ऐतिहासिक रूप से सोने के आयात को प्रबंधित करने के लिए कस्टम ड्यूटी (सीमा शुल्क) का इस्तेमाल किया है, जिसकी दरें हाल ही में तस्करी को रोकने और घरेलू मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देने के लिए 15% से घटाकर लगभग 6% कर दी गई थीं। हालांकि, इतनी गहरी जड़ें जमा चुकी मांग के खिलाफ इन उपायों का दीर्घकालिक प्रभाव सीमित रहा है।
वैश्विक मूल्य चालक और मैक्रोइकॉनॉमिक जोखिम
सोने के आयात में वर्तमान वृद्धि वैश्विक मूल्य रुझानों से closely tied है। भू-राजनीतिक तनाव, प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रास्फीति की चिंताएं और वैश्विक स्तर पर केंद्रीय बैंकों द्वारा सोने की भारी खरीदारी ने कीमतों को बढ़ाया है, जिससे डॉलर के संदर्भ में आयात अधिक महंगा हो गया है। यह वैश्विक स्थिति, भारत की बड़ी आयात मात्रा के साथ मिलकर, अंतरराष्ट्रीय कीमतों को प्रभावित करती है। मुख्य आपूर्तिकर्ताओं में स्विट्जरलैंड और यूएई शामिल हैं।
संरचनात्मक कमजोरी और मुद्रा पर दबाव
हालांकि अधिकारी सोने और चांदी के आयात को लेकर घबराहट के बजाय सतर्कता पर जोर दे रहे हैं, लेकिन गैर-उत्पादक संपत्तियों के आयात पर संरचनात्मक निर्भरता महत्वपूर्ण जोखिम पैदा करती है। सोने के उच्च आयात बिल के कारण पर्याप्त विदेशी मुद्रा का उपयोग बुनियादी ढांचे और विनिर्माण जैसे अधिक उत्पादक क्षेत्रों के बजाय इन पर खर्च हो रहा है, जो पूंजी आवंटन को प्रभावित करता है। यह निर्भरता भारत को वैश्विक पूंजी प्रवाह की अस्थिरता के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती है और रुपये पर नीचे की ओर दबाव डालती है। ईटीएफ के माध्यम से सोने की बचत को औपचारिक बनाने के प्रयासों के बावजूद, भौतिक सोने की आवश्यकता का मतलब है कि आयात दबाव बना हुआ है। गहरी सांस्कृतिक मांग के खिलाफ आयात प्रतिबंधों की प्रभावशीलता संदिग्ध है। यह चालू खाता शेष की दीर्घकालिक स्थिरता के बारे में चिंताएं बढ़ाता है और सरकार बाहरी ऋण का प्रबंधन कैसे करेगी, यह भी अनिश्चित है। चांदी के आयात में 142.87% की वृद्धि इन व्यापारिक दबावों को और बढ़ाती है।
भविष्य का दृष्टिकोण
आयात प्रतिबंधों का सरकार का इरादा व्यापार घाटे को सक्रिय रूप से प्रबंधित करने का संकेत देता है, लेकिन मजबूत घरेलू मांग के खिलाफ उनकी दीर्घकालिक प्रभावशीलता अनिश्चित बनी हुई है। विश्लेषक भविष्य के व्यापार घाटे के प्रमुख संकेतकों के रूप में सोने के आयात के रुझानों और वैश्विक व्यापार पैटर्न पर बारीकी से नजर रखेंगे। वैश्विक सोने की कीमतों में अस्थिरता, चल रही भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं और घरेलू मांग का परस्पर प्रभाव भारत के बाहरी क्षेत्र के प्रदर्शन को आकार देना जारी रखेगा, जो मुद्रास्फीति और मुद्रा प्रबंधन को प्रभावित कर सकता है।