Gold ETF में आई तूफानी तेजी: निवेशकों की चांदी, 40% पार हुई चमक, जानें वजह

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Gold ETF में आई तूफानी तेजी: निवेशकों की चांदी, 40% पार हुई चमक, जानें वजह
Overview

इस साल गोल्ड ईटीएफ (Gold ETFs) ने निवेशकों को मालामाल कर दिया है, जहां इनमें **40%** से ज्यादा का उछाल आया है। वहीं, सिल्वर ईटीएफ (Silver ETFs) ने तो **140%** से भी ज्यादा की छलांग लगाई है। इस तूफानी तेजी के पीछे ग्लोबल टेंशन और सेंट्रल बैंकों की ताबड़तोड़ खरीदारी है। हालांकि, अब निवेशक सिर्फ दाम बढ़ने पर ध्यान नहीं दे रहे, बल्कि एक स्ट्रेटेजिक (Strategic) अप्रोच अपना रहे हैं।

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ग्लोबल अनिश्चितता के बीच शानदार प्रदर्शन

पिछले साल से ही गोल्ड और सिल्वर ईटीएफ (Gold and Silver ETFs) का प्रदर्शन शानदार रहा है। सिल्वर ईटीएफ में तो तीन अंकों में रिटर्न देखने को मिला है। यह दिखाता है कि ग्लोबल अनिश्चितता (Global Uncertainty) के दौर में कीमती धातुओं को एक सेफ-हेवन (Safe-Haven) एसेट के तौर पर कितनी मांग है। भारत में अक्षय तृतीया के मौके पर भी सोने की यह स्थिति और मजबूत हुई है। पर, इन बड़े आंकड़ों के पीछे निवेशक की सोच भी बदल रही है। निवेशक अब सिर्फ रिटर्न पर ही नहीं, बल्कि इस तेजी के पीछे की वजह और इसके लॉन्ग-टर्म (Long-term) टिकाऊपन को भी समझ रहे हैं। वे गोल्ड की बदलती भूमिका पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।

गोल्ड ईटीएफ ने शेयरों को पछाड़ा

इस साल गोल्ड ईटीएफ (Gold ETFs) स्टॉक मार्केट को पछाड़ रहे हैं। अप्रैल के मध्य तक SPDR Gold Trust (GLD) में 11.7% की बढ़त देखी गई, जबकि S&P 500 सिर्फ 1.6% ही बढ़ पाया। पिछले साल GLD ने 64% का रिटर्न दिया, जबकि S&P 500 पिछड़ गया। इसकी एक बड़ी वजह मिडिल ईस्ट (Middle East) में चल रहा संघर्ष और अमेरिकी वित्तीय अस्थिरता जैसी ग्लोबल टेंशन हैं, जिसने सोने को एक वैल्यू स्टोर (Store of Value) के तौर पर आकर्षक बनाया है। हालांकि, ऐतिहासिक तौर पर गोल्ड का एनुअल रिटर्न (CAGR) लगभग 8.2% रहा है, जो S&P 500 के 10.1% से थोड़ा कम है। लेकिन बाजार में तनाव और महंगाई के दौर में यह शॉर्ट-टू-मीडियम टर्म (Short-to-Medium Term) हेज (Hedge) के तौर पर काफी कारगर साबित हुआ है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, जनवरी 2026 में सोने की कीमत $5,595 प्रति औंस के रिकॉर्ड हाई पर पहुंच गई थी।

गोल्ड की मांग बढ़ाने वाले मुख्य फैक्टर

गोल्ड और इससे जुड़े ईटीएफ की मांग कई वजहों से बढ़ रही है। पहली, लगातार बनी हुई जियो-पॉलिटिकल टेंशन (Geopolitical Risks), जैसे अमेरिका-ईरान संघर्ष का बढ़ना, सेफ-हेवन एसेट की डिमांड बढ़ा रही है। दूसरी, सेंट्रल बैंक (Central Banks) बड़े पैमाने पर सोना खरीद रहे हैं। अनुमान है कि 2026 में वे करीब 900 टन सोना खरीद सकते हैं, जो सोने को एक स्ट्रेटेजिक रिजर्व (Strategic Reserve) के तौर पर मजबूती देता है। खासकर चीन जैसे इमर्जिंग मार्केट (Emerging Market) इसमें सक्रिय हैं। महंगाई का बढ़ता दबाव और अमेरिका की मॉनेटरी पॉलिसी (Monetary Policy) में संभावित बदलाव, जैसे फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) की तरफ से रेट कट, भी सोने को आकर्षक बना रहे हैं, क्योंकि यह एक ऐसा एसेट है जिस पर कोई ब्याज नहीं मिलता। रेगुलेटरी बदलाव (Regulatory Changes) भी मार्केट को असर कर रहे हैं। भारत में SEBI के मार्च 2026 के मास्टर सर्कुलर के मुताबिक, गोल्ड ईटीएफ को कम से कम 95% फिजिकल गोल्ड या उससे जुड़े इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करना होगा, और गोल्ड-बैक्ड डेरिवेटिव्स (Gold-backed derivatives) में बहुत सीमित एक्सपोजर की अनुमति होगी। इसका मकसद वैल्यूएशन को स्टैंडर्डाइज करना और भरोसा बढ़ाना है।

लागत और ईटीएफ स्ट्रक्चर पर चिंताएं

शानदार रैली के बावजूद, कुछ चिंताएं बनी हुई हैं। पिछले साल के असाधारण रिटर्न कब तक जारी रहेंगे, यह एक बड़ा सवाल है। पुराने और स्थापित गोल्ड ईटीएफ जैसे SPDR Gold Shares (GLD) का एक्सपेंस रेशियो (Expense Ratio) 0.40% और iShares Gold Trust (IAU) का 0.25% है। यह नए और सस्ते विकल्पों, जैसे SPDR Gold MiniShares (GLDM) का 0.10%-0.18% या iShares Gold Trust Micro (IAUM) का 0.07%, की तुलना में काफी ज्यादा है। यह फीस का अंतर लॉन्ग-टर्म रिटर्न को काफी कम कर सकता है, भले ही GLD के पास $160 बिलियन से ज्यादा की एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (Assets Under Management) हों। इसके अलावा, कुछ ईटीएफ में गोल्ड फ्यूचर्स (Gold Futures) और डेरिवेटिव्स (Derivatives) की बढ़ी हुई अनुमति फाइनेंशियल कॉन्ट्रैक्ट रिस्क (Financial Contract Risks) लाती है। इसका मतलब है कि ईटीएफ का परफॉर्मेंस फिजिकल गोल्ड की कीमतों को पूरी तरह से ट्रैक नहीं कर सकता, खासकर जब मार्केट में भारी उतार-चढ़ाव हो या लीवरेज्ड पोजीशन (Leveraged Positions) को जल्दी बेचना पड़े। भले ही सोने ने हाल ही में शेयरों को पीछे छोड़ा है, पर इसका हिस्टोरिकल CAGR कम है। कुछ पुराने दौरों, जैसे 1981 और 1990 में, यह S&P 500 से पिछड़ गया था। निवेशकों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ईटीएफ एक्सपोजर (Exposure) देते हैं, डायरेक्ट फिजिकल ओनरशिप (Physical Ownership) नहीं, जिसका मतलब है कि फिजिकल मेटल रखने वालों का नियंत्रण मार्केट की चाल से स्वतंत्र रहता है।

आउटलुक: सतर्क आशावाद और स्ट्रेटेजिक इन्वेस्टिंग

विश्लेषकों ने 2026 के लिए सोने को लेकर सतर्क आशावादी (Cautiously Optimistic) नजरिया जताया है। उनका अनुमान है कि साल के अंत तक सोने की कीमतें $4,325/oz और $5,000/oz के बीच रह सकती हैं। यह सेंट्रल बैंकों की जारी मांग और अमेरिकी मॉनेटरी ईजिंग (Monetary Easing) की उम्मीदों पर टिका होगा। सेंट्रल बैंकों द्वारा सोने की खरीदारी का ट्रेंड जारी रहने की उम्मीद है, हालांकि वे ईटीएफ के बजाय सीधे सोना खरीद सकते हैं। निवेशक अभी भी सक्रिय हैं; कुल मिलाकर इनफ्लो (Inflows) मजबूत हैं, लेकिन कुछ सेलेक्टिव सेलिंग (Selective Selling) के भी संकेत हैं, जो सिर्फ रिटर्न के पीछे भागने के बजाय पोर्टफोलियो मैनेजमेंट (Portfolio Management) का अधिक स्ट्रेटेजिक अप्रोच दिखाता है। रेगुलेटरी अपडेट, खासकर भारत में, शायद वैल्यूएशन को स्टैंडर्डाइज करने में मदद करें, जिससे प्रोडक्ट की इंटीग्रिटी (Integrity) पर निवेशकों का भरोसा बढ़ सकता है। हालांकि, मार्केट की दिशा अंततः जारी जियो-पॉलिटिकल इवेंट्स, इन्फ्लेशन ट्रेंड्स (Inflation Trends) और व्यापक आर्थिक स्थिरता पर निर्भर करेगी—वो फैक्टर्स जिनसे सोना अच्छी तरह निपट सकता है।

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