सोने की चाल और निवेशकों की घबराहट
गोल्ड ETF में फरवरी के दौरान नेट इनफ्लो में 77% की भारी गिरावट देखी गई, जो जनवरी के $2.5 बिलियन के रिकॉर्ड स्तर से घटकर $565 मिलियन रह गया। इस बड़ी गिरावट का मुख्य कारण सोने की कीमतों में आया तेज उतार-चढ़ाव है।
जनवरी के अंत में सोने की कीमत में आई करीब 9% की एक दिन की बड़ी गिरावट ने निवेशकों की घबराहट बढ़ा दी थी। इसके चलते कई निवेशकों ने मुनाफावसूली (Profit-taking) की और कुछ समय के लिए बाजार से दूरी बना ली।
हालांकि, यह गिरावट मुख्य रूप से एक 'टैक्टिकल पॉज़' यानी सामयिक ठहराव का संकेत देती है, न कि सोने की मांग में फंडामेंटल यानी बुनियादी कमी का। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों के अनुसार, कुल एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) अभी भी $20 बिलियन के करीब बना हुआ है, जो बाजार में सोने की मजबूती को दर्शाता है।
भारतीय बाजार के लिए खास क्यों?
भारतीय बाजार के लिए एक अच्छी खबर यह है कि SEBI ने हाल ही में नए नियम जारी किए हैं। इन नियमों के तहत, इक्विटी म्यूचुअल फंड (Equity Mutual Funds) अपनी कुल संपत्ति का 10% तक हिस्सा गोल्ड और सिल्वर ETFs में निवेश कर सकते हैं। इससे गोल्ड ETF में निवेश का दायरा बढ़ेगा और लंबी अवधि के इनफ्लो को सहारा मिलेगा।
ग्लोबल मार्केट का असर
अन्य कीमती धातुओं की बात करें तो, सिल्वर ETFs में भी इनफ्लो में कमी आई, लेकिन गोल्ड ETF जितनी तेज नहीं। वहीं, प्लैटिनम ETFs को औद्योगिक मांग में नरमी के चलते कुछ आउटफ्लो का सामना करना पड़ा। ऐतिहासिक रूप से, सोने की कीमतों में तेज उछाल के बाद गिरावट आने पर अल्पकालिक आउटफ्लो आम बात है, खासकर जब निवेशक मुनाफावसूली करते हैं। लेकिन, जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता (Geopolitical Uncertainty) और इन्फ्लेशन हेजिंग (Inflation Hedging) जैसी सोने की मुख्य मांगें फिर से हावी हो जाती हैं।
अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) की मार्च 2026 में ब्याज दरों को स्थिर रखने की उम्मीदें भी सोने के लिए अनुकूल माहौल बना रही हैं। यह एक स्थिर मैक्रोइकोनॉमिक बैकड्रॉप प्रदान करता है, जो महंगाई से बचाव के तौर पर सोने के लिए फायदेमंद है।
भविष्य का अनुमान
विश्लेषकों का मानना है कि 2026 में सोने की कीमतें $2,200 से $2,500 प्रति औंस तक जा सकती हैं। केंद्रीय बैंकों द्वारा लगातार सोने की खरीदारी और जारी भू-राजनीतिक जोखिम इसमें अहम भूमिका निभाएंगे। हालांकि, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि विकसित देशों में ऊंची ब्याज दरें सोने की बड़ी बढ़त को सीमित कर सकती हैं।
