पिछले हफ्ते ग्लोबल गोल्ड एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड्स (ETFs) में इनफ्लो (निवेश) और आउटफ्लो (निकासी) लगभग बराबर रहा, दोनों ही तरफ करीब **$1.67 बिलियन** का कारोबार हुआ। जहाँ एक तरफ केंद्रीय बैंक सोने के बड़े खरीदार बने हुए हैं, वहीं अमेरिका और जापान के निवेशकों ने सोने में अपनी होल्डिंग कम की है। इसकी मुख्य वजह कच्चे तेल की बढ़ी कीमतें और अमेरिकी फेडरल रिजर्व का सख्त रुख है, जो कीमती धातु की मांग को कम कर रहा है।
सोने की चाल में ठहराव
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले हफ्ते दुनियाभर के गोल्ड ईटीएफ में $1.668 बिलियन का इनफ्लो और $1.67 बिलियन का आउटफ्लो देखा गया, जिससे कुल मिलाकर लगभग एक संतुलन की स्थिति बनी रही। यह स्थिति बाजार में चल रही सतर्कता को दर्शाती है, जहाँ भू-राजनीतिक तनावों और बदलती आर्थिक नीतियों के बीच सोने की पारंपरिक सुरक्षित संपत्ति वाली छवि पर सवाल उठ रहे हैं।
अमेरिका की पॉलिसी और कच्चे तेल का असर
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बावजूद, जिसने ऐतिहासिक रूप से सोने की मांग को बढ़ाया है, हाल ही में सोने की कीमतों पर दबाव देखा गया, जो पिछले हफ्ते 2% से अधिक गिर गईं। इसका एक बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 13% की तेजी है। कमोडिटी की कीमतों में इस उछाल ने महंगाई (inflation) की आशंकाओं को फिर से जगा दिया है, जिससे बाजार यह उम्मीद कर रहा है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व और सख्त रवैया अपना सकता है। फेडरल रिजर्व के अधिकारियों की सख्त टिप्पणियों, जिसमें सितंबर में ब्याज दरें बढ़ाने का संकेत भी शामिल है, ने सोने जैसी बिना ब्याज देने वाली संपत्ति को रखने की अवसर लागत (opportunity cost) को बढ़ा दिया है।
निवेशकों का अलग-अलग रुख
प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में निवेशकों का व्यवहार बंटा हुआ दिख रहा है। उत्तरी अमेरिका और जापान से सोने में निवेश निकालने का एक महत्वपूर्ण चलन देखा गया है, जहाँ अमेरिका से $507 मिलियन और जापान से $261 मिलियन का आउटफ्लो हुआ। इसके विपरीत, यूरोपीय निवेशक, विशेष रूप से यूके में, $370 मिलियन के साथ नेट खरीदार बने रहे। चीन भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, जहाँ $88 मिलियन का शुद्ध इनफ्लो हुआ है, क्योंकि वहां का केंद्रीय बैंक सोने की खरीदारी जारी रखे हुए है। भारतीय निवेशकों के लिए, देश साल-दर-साल $3.87 बिलियन के मजबूत नेट इनफ्लो की स्थिति बनाए हुए है, जो कि चीन के बाद सबसे ज्यादा सकारात्मक इनफ्लो वाले क्षेत्रों में से एक है।
ऐतिहासिक प्रदर्शन और आगे की राह
जनवरी में $5,608 प्रति औंस के शिखर से सोने की कीमतों में 27.5% से अधिक की महत्वपूर्ण गिरावट आई है। वर्तमान में, सोना दो विपरीत ताकतों के बीच फंसा हुआ है: भू-राजनीतिक अस्थिरता के बीच सुरक्षा की तलाश और बढ़ती ब्याज दरों का दबाव, जो आमतौर पर अमेरिकी डॉलर को मजबूत करती हैं और सोने जैसी गैर-उपज वाली संपत्तियों की अपील को कम करती हैं। विश्लेषकों का मानना है कि जब तक फेडरल रिजर्व की नीतिगत दिशा और ऊर्जा बाजारों की अस्थिरता को लेकर अधिक स्पष्टता नहीं आ जाती, तब तक सोने की कीमतें एक दायरे में कारोबार कर सकती हैं। निवेशकों को आगामी अमेरिकी महंगाई के आंकड़ों और केंद्रीय बैंक की नीतिगत बैठकों पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि ये कीमती धातुओं की अगली चाल तय कर सकती हैं।
