ग्लोबल गोल्ड ईटीएफ (ETFs) में लगातार पांचवें हफ़्ते इनफ्लो (inflow) देखा गया है, क्योंकि सोने की कीमत **$4,600** प्रति औंस के पार निकल गई है। अमेरिकी डॉलर में कमजोरी और भू-राजनीतिक तनाव के बीच निवेशक गोल्ड को सेफ-हेवन एसेट (safe-haven asset) के तौर पर देख रहे हैं। भारत में, अगस्त 2026 के पहले पखवाड़े में लोकल गोल्ड ईटीएफ में **₹1,179 करोड़** आए।
गोल्ड ईटीएफ़ में क्यों बढ़ रहा है निवेशकों का भरोसा?
फिजिकली-बैक गोल्ड एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड्स (ETFs) की ग्लोबल डिमांड मजबूत बनी हुई है। लगातार पांचवें हफ़्ते इसमें इनफ्लो दर्ज किया गया है। यह निवेशकों के बदलते सेंटिमेंट (sentiment) को दिखाता है, क्योंकि सोने की कीमतें $4,600 प्रति औंस के ऊपर ट्रेड कर रही हैं।
क्या हैं इसके पीछे के कारण?
यह लगातार तेजी बाज़ार के जटिल इकोनॉमिक माहौल का संकेत है। सबसे बड़ा कारण है अमेरिकी डॉलर का कमजोर होना, जो US ट्रेजरी के बॉन्ड बायबैक प्रोग्राम के कारण हुआ है। जब डॉलर कमजोर होता है और बॉन्ड यील्ड (yield) पर दबाव आता है, तो सोने जैसी नॉन-यील्डिंग एसेट्स (non-yielding assets) निवेशकों के लिए ज़्यादा आकर्षक हो जाती हैं। इसके अलावा, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) को लेकर बढ़ती भू-राजनीतिक टेंशन (geopolitical tensions) ने सोने की सेफ-हेवन (safe-haven) भूमिका को और मजबूत किया है।
भारतीय बाज़ार का ट्रेंड
सोने के प्रति यह ग्लोबल क्रेज़ (craze) भारतीय बाज़ार में भी दिख रहा है। अगस्त 2026 के पहले आधे में, भारतीय गोल्ड ईटीएफ़ में ₹1,179 करोड़ का नेट इनफ्लो हुआ। भारतीय निवेशक अब फिजिकल गोल्ड की जगह इन इंस्ट्रूमेंट्स (instruments) का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो ज़्यादा लिक्विड (liquid) और ट्रांसपेरेंट (transparent) हैं।
आगे क्या देखना होगा?
फिलहाल गोल्ड में पॉजिटिव मोमेंटम (momentum) बना हुआ है, लेकिन चुनौतियां भी हैं। निवेशक सेफ-हेवन डिमांड के साथ-साथ इकोनॉमिक रिस्क (economic risks) को भी देख रहे हैं। लॉन्ग-टर्म US ट्रेजरी यील्ड (yield) सोने के लिए एक बाधा बन सकती है, क्योंकि इससे गोल्ड होल्ड करने की अपॉर्च्युनिटी कॉस्ट (opportunity cost) बढ़ जाती है। एनर्जी-लेड इन्फ्लेशन (energy-led inflation) भी लगातार दबाव बनाए हुए है, जिससे सेंट्रल बैंक्स को अपनी मॉनेटरी पॉलिसी (monetary policy) को उम्मीद से ज़्यादा सख्त रखना पड़ सकता है।
मार्केट पार्टिसिपेंट्स (market participants) अब मैक्रोइकॉनॉमिक (macroeconomic) इवेंट्स पर नज़र रखे हुए हैं, जो सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव ला सकते हैं। जैक्सन होल सिम्पोजियम (Jackson Hole Symposium) और आने वाले US PCE इन्फ्लेशन डेटा (inflation data) से इंटरेस्ट रेट पॉलिसी (interest rate policy) को लेकर और स्पष्टता मिलने की उम्मीद है। आने वाले हफ़्तों में सोने का प्रदर्शन सेंट्रल बैंक के फैसलों और चल रहे भू-राजनीतिक विकास पर निर्भर करेगा।
