गोल्ड की कीमतों पर दबाव के बावजूद निवेशकों का भरोसा बरकरार है। पिछले एक हफ्ते में गोल्ड-बैक्ड ETFs में **$1.72 बिलियन** का निवेश आया है, जो लगातार दसवें सप्ताह की खरीदारी है।
बाजार में क्या चल रहा है?
गोल्ड की कीमतों में ग्लोबल मार्केट में आई गिरावट के बावजूद गोल्ड एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड्स (ETFs) में निवेशकों की दिलचस्पी कम नहीं हुई है। पिछले हफ्ते जहां $1.59 बिलियन की निकासी (Redemption) हुई, वहीं कुल मिलाकर $1.72 बिलियन का ताजा निवेश आया, जो मार्केट के उतार-चढ़ाव के बीच भी निवेशकों के भरोसे को दर्शाता है।
क्यों दबाव में है सोना?
सोने की कीमतों में जनवरी के $5,608 प्रति औंस के पीक से अब तक लगभग 26% की भारी गिरावट आई है और यह $4,150 के आसपास कारोबार कर रहा है। इसका मुख्य कारण अमेरिका में 10-year Treasury yields का 5.50% के करीब पहुंचना है। जब सरकारी बॉन्ड्स पर ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो निवेशक गोल्ड जैसे एसेट्स से दूरी बना लेते हैं, क्योंकि इनसे कोई इंटरेस्ट या डिविडेंड नहीं मिलता। इसके अलावा, फेडरल रिजर्व द्वारा अक्टूबर में ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना ने डॉलर को मजबूत किया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के लिए सोना महंगा हो गया है।
अलग-अलग देशों का रुख
बाजार में एक दिलचस्प ट्रेंड देखने को मिल रहा है। अमेरिकी निवेशक जहां $683 मिलियन की बिकवाली कर रहे हैं, वहीं ब्रिटेन, चीन, स्विट्जरलैंड और कनाडा के निवेशक लगातार अपनी पोजीशन बढ़ा रहे हैं। यह बताता है कि अमेरिकी निवेशकों पर मैक्रो-इकोनॉमिक डेटा का असर ज्यादा है, जबकि बाकी दुनिया में गोल्ड की मांग अभी भी मजबूत बनी हुई है।
भारत का सीजनल फैक्टर
भारतीय निवेशकों के लिए हालात थोड़े अलग हैं। जल्द ही शादियों और फेस्टिव सीजन की शुरुआत होने वाली है, जिससे फिजिकल गोल्ड की मांग बढ़ने की उम्मीद है। यह स्थानीय डिमांड अंतरराष्ट्रीय संस्थागत बिकवाली (Institutional selling) को संतुलित करने का काम कर सकती है।
आगे क्या ट्रैक करें?
निवेशकों की नजर अब अमेरिका के मैन्युफैक्चरिंग डेटा, नॉन-फार्म पेरोल रिपोर्ट्स और PCE इन्फ्लेशन इंडेक्स पर है। ये इंडिकेटर्स तय करेंगे कि फेडरल रिजर्व की पॉलिसी क्या होगी, जिसका सीधा असर सोने की कीमतों पर पड़ेगा।
