लगातार इनफ्लो: निवेशक क्यों लगा रहे हैं दांव?
फरवरी में भी सोने के एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETFs) में पैसा आता रहा, भले ही सोने की कीमतें थोड़ी नरम पड़ीं। यह ग्लोबल और भारतीय बाज़ार दोनों में दिख रहा पैटर्न बताता है कि निवेशक अब आर्थिक अनिश्चितताओं से बचाव के लिए सोने को एक 'डिफेंसिव एसेट' (defensive asset) के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। यह इनफ्लो (inflow) इस बात पर जोर देता है कि निवेशक छोटी अवधि के मूल्य उतार-चढ़ाव के बजाय, पोर्टफोलियो की लंबी अवधि की स्थिरता को प्राथमिकता दे रहे हैं, खासकर तब जब शेयर बाज़ार जैसे कि निफ्टी 50 और सेंसेक्स में मामूली गिरावट देखी गई।
रिटेल निवेशकों की गोल्ड ETF में 'लॉटरी'
भारतीय गोल्ड ETF ने फरवरी के दौरान ₹5,255 करोड़ का नेट इनफ्लो (net inflow) आकर्षित किया। यह डिमांड, लगातार नौवें महीने जारी रही, और यह तब देखी गई जब स्थानीय सोने की कीमतों में 3.5% की गिरावट आई और शेयर बाज़ारों में भी कुछ नरमी रही। ग्लोबल गोल्ड ETF में भी जबरदस्त दिलचस्पी देखी गई, जिसमें $5.3 बिलियन का इनफ्लो आया। कुल ग्लोबल होल्डिंग्स (global holdings) रिकॉर्ड 4,171 टन पर पहुंच गईं, जिनकी कुल वैल्यू $701 बिलियन है। इस तरह के स्थिर इनफ्लो ऐतिहासिक रूप से तब देखे गए हैं जब सिस्टमैटिक रिस्क (systemic risk) ज्यादा रहा हो, जैसे कि ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस (Global Financial Crisis) और कोविड-19 महामारी के समय। निवेशक भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tensions) और अमेरिकी कर्ज को लेकर चिंताओं के बीच ऐसे एसेट्स की तलाश में रहते हैं जो शेयरों से अलग प्रदर्शन करें। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (World Gold Council) ने भी नोट किया है कि यह लगातार डिमांड बताती है कि निवेशक बढ़ते भू-राजनीतिक जोखिमों और बदलती आर्थिक परिस्थितियों के कारण सोने में अपना निवेश बढ़ा रहे हैं।
अलग-अलग क्षेत्रों की डिमांड में अंतर
ग्लोबल इनफ्लो में नॉर्थ अमेरिका सबसे आगे रहा, जहाँ $4.7 बिलियन का निवेश आया। भू-राजनीतिक जोखिम, डॉलर का कमजोर होना और ब्याज दरों का कम होना इसके मुख्य कारण रहे। एशिया से भी डिमांड सकारात्मक बनी रही, जिसमें भारत का योगदान $565 मिलियन रहा, हालांकि पिछले महीनों की तुलना में इसकी रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ी। यूरोप अकेला ऐसा क्षेत्र रहा जहाँ से $1.8 बिलियन का आउटफ्लो (outflow) देखा गया, जिसका बड़ा हिस्सा यूनाइटेड किंगडम से था। यह अंतर अलग-अलग आर्थिक परिस्थितियों या निवेशकों की रणनीतियों के कारण हो सकता है। सोने के अलावा, भारतीय निवेशक कॉपर, यूरेनियम और दुर्लभ पृथ्वी धातुओं (rare earths) जैसी कमोडिटी (commodity) के लिए ग्लोबल ETF में भी निवेश कर रहे हैं, जो औद्योगिक धातुओं में व्यापक विविधीकरण (diversification) का संकेत देता है। वहीं, सिल्वर ETF में फंड के प्रवाह में भारी गिरावट देखी गई, जिसमें डोमेस्टिक सिल्वर कीमतों में गिरावट के साथ ही 21% से अधिक की एयूएम (AUM - Assets Under Management) में कमी आई।
एनालिस्ट का नज़रिया और बाज़ार के संकेत
एनालिस्ट्स (Analysts) का कहना है कि भले ही भू-राजनीतिक घटनाएं छोटी अवधि के लिए कीमतों में उछाल ला सकती हैं, लेकिन जैसे ही तात्कालिक तनाव कम होते हैं, लंबी अवधि के प्रीमियम (premiums) फीके पड़ सकते हैं, जिससे कीमतों में सुधार की संभावना बनती है। बाज़ार के आंकड़े मजबूत इंस्टीट्यूशनल इंटरेस्ट (institutional interest) की ओर इशारा करते हैं, जिसमें 24 फरवरी, 2026 तक COMEX नेट लॉन्ग पोजीशन 300 टन से अधिक रही। यह बताता है कि यह केवल सट्टेबाजी नहीं, बल्कि रणनीतिक पोर्टफोलियो एडजस्टमेंट (strategic portfolio adjustments) है। भारतीय बाज़ार नियामक SEBI (Securities and Exchange Board of India) द्वारा हाल में किए गए नियम बदलावों से अब म्यूचुअल फंड (mutual funds) सोने और चांदी में अपना एक्सपोजर (exposure) बढ़ा सकते हैं, जिससे भविष्य में इनफ्लो को सपोर्ट मिल सकता है। JP Morgan जैसी संस्थाएं 2026 तक निवेशकों और सेंट्रल बैंकों की मजबूत डिमांड जारी रहने का अनुमान लगा रही हैं, जो पोर्टफोलियो विविधीकरण में सोने की निरंतर भूमिका को रेखांकित करता है।
संभावित जोखिम और बाज़ार की गतिशीलता
यूरोप, खासकर यूनाइटेड किंगडम से नेट आउटफ्लो (net outflow) का आंकड़ा ग्लोबल इनफ्लो के विपरीत है और यह प्रमुख बाज़ारों में संभावित आर्थिक कमजोरियों या अलग-अलग रिस्क लेने की क्षमता का संकेत देता है। सोने की कीमत में अंतर्निहित अस्थिरता (volatility), जिसमें तेज साप्ताहिक उलटफेर और महत्वपूर्ण दैनिक गिरावटें (फरवरी के एक सप्ताह में लगभग 3% की गिरावट सहित) शामिल हैं, निवेशकों के लिए जोखिम पैदा करती है। भले ही सोना एक सुरक्षित आश्रय (safe haven) के रूप में काम करता है, लेकिन डॉलर की मजबूती या बाज़ार की भावनाओं में बदलाव से इसकी कीमतों पर असर पड़ सकता है, जिससे सुधार की संभावना रहती है। भू-राजनीतिक घटनाओं के दौरान देखे जाने वाले प्रीमियम आमतौर पर तनाव कम होने पर घट जाते हैं। लगातार ऊंची सोने की कीमतें भी मांग को कम कर सकती हैं, खासकर यदि ग्लोबल आर्थिक विकास में तेजी आती है, जिससे सुरक्षित आश्रयों की तुलना में ग्रोथ-ओरिएंटेड निवेश (growth-oriented investments) अधिक आकर्षक हो जाते हैं। बाज़ार स्थिरकॉइन जारीकर्ताओं (stablecoin issuers) जैसे नए खरीदारों से भी प्रभावित हो रहा है, जो डिमांड ड्राइवर्स (demand drivers) को और जटिल बना रहा है।