भारतीय गोल्ड ईटीएफ (Gold ETF) के प्रदर्शन में इन दिनों बड़ा अंतर देखा जा रहा है। बाजार की उठापटक के चलते शॉर्ट-टर्म रिटर्न में बड़े उतार-चढ़ाव दिख रहे हैं।
क्यों हो रहा है रिटर्न में अंतर?
गोल्ड ईटीएफ (Gold ETF) में निवेश करने वाले निवेशकों को हाल ही में मिले-जुले नतीजे देखने को मिले हैं। सोने की कीमतों में चल रही अस्थिरता और ईटीएफ के ट्रैकिंग एरर (Tracking Error) के कारण यह स्थिति बनी है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 7 जुलाई 2026 तक के एक महीने के दौरान Mirae Asset Gold ETF ने -6.6% का रिटर्न दिया। वहीं, इसी अवधि में इसके बेंचमार्क का रिटर्न 0.0% रहा, जो एक बड़ा अंतर दिखाता है। इससे पता चलता है कि ईटीएफ कितनी बारीकी से सोने की कीमत को ट्रैक कर पाता है, यह भी महत्वपूर्ण है।
परफॉरमेंस और ट्रैकिंग एरर को समझना
गोल्ड ईटीएफ का मूल्यांकन करते समय, निवेशकों को यह देखना होता है कि फंड मैनेजमेंट फीस और अन्य खर्चों को घटाने के बाद वह फिजिकल गोल्ड की कीमत को कितना ट्रैक कर रहा है। फंड के रिटर्न और बेंचमार्क के रिटर्न के बीच बड़े अंतर को 'ट्रैकिंग एरर' कहा जाता है। Mirae Asset Gold ETF के मामले में, 6.6% का शॉर्ट-टर्म परफॉरमेंस गैप बताता है कि मैनेजमेंट की कुशलता और एक्सपेंस रेश्यो (Expense Ratio) निवेशक के नेट रिटर्न पर कितना असर डालते हैं। वहीं, एक साल जैसे लंबे समय में, इसी फंड ने अपने बेंचमार्क से 37.1% ज्यादा रिटर्न दिया, जबकि बेंचमार्क का रिटर्न 10.1% था।
गोल्ड निवेशकों के लिए टाइम होराइजन क्यों जरूरी?
गोल्ड ईटीएफ में लीडरशिप निवेश की अवधि के हिसाब से बदलती रहती है। कोई फंड एक महीने में सबसे अच्छा कर सकता है, तो कोई छह महीने या तीन साल में। उदाहरण के लिए, Aditya Birla SL Gold ETF ने छह महीने और एक साल में क्रमशः 5.2% और 47.6% का दमदार रिटर्न दिखाया है। वहीं, ICICI Prudential Gold ETF ने तीन साल की अवधि में 33.7% का रिटर्न दर्ज किया है। ये आंकड़े ₹1,500 करोड़ से ज्यादा असेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) वाले बड़े फंड्स पर आधारित हैं, और यह साफ करते हैं कि हर निवेशक के लिए कोई एक 'बेस्ट' फंड नहीं है।
जो निवेशक सोने को लॉन्ग-टर्म हेज (Long-term hedge) या पोर्टफोलियो डाइवर्सिफायर (Portfolio diversifier) के तौर पर देख रहे हैं, उन्हें मंथली उतार-चढ़ाव पर ध्यान देने के बजाय ट्रैकिंग एरर, फंड के एक्सपेंस रेश्यो और कई सालों में उसके कंसिस्टेंट परफॉरमेंस पर गौर करना चाहिए। भविष्य में, निवेशकों को हर महीने के परफॉरमेंस रिपोर्ट और फंड के एक्सपेंस रेश्यो में किसी भी बदलाव पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि ये फैक्टर समय के साथ निवेशक के नेट वैल्यू पर सीधा असर डालते हैं।
