गोल्ड ईटीएफ (Gold ETF) में निवेश की रफ्तार कम हो गई है। अक्टूबर में नेट इनफ्लो घटकर **₹3,300 करोड़** रह गया, जो सितंबर में **₹4,450 करोड़** था। इस गिरावट के पीछे SEBI का वह निर्देश है जिसमें फंड ऑफ फंड्स (FoFs) में नई सब्सक्रिप्शन पर रोक लगा दी गई है।
अक्टूबर के महीने में गोल्ड-बेस्ड निवेश उत्पादों में सुस्ती देखी गई है। सितंबर में दर्ज ₹4,450 करोड़ के मुकाबले अक्टूबर में नेट इनफ्लो घटकर ₹3,300 करोड़ के स्तर पर आ गया। यह बदलाव भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) द्वारा एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMCs) को जारी किए गए उस नए गाइडेंस के बाद आया है, जिसमें 'गोल्ड फंड ऑफ फंड्स' (Gold FoFs) में फ्रेश सब्सक्रिप्शन को सीमित करने का निर्देश दिया गया है।
निवेश पर रेगुलेटरी असर
16 अक्टूबर, 2026 से कई बड़ी म्यूचुअल फंड हाउस ने गोल्ड फंड ऑफ फंड्स में नई एंट्री पर रोक लगा दी है। यह कदम पूरी तरह से गोल्ड इन्वेस्टमेंट पर बैन नहीं है, बल्कि इसका मकसद घरेलू गोल्ड इंपोर्ट को नियंत्रित करना है ताकि भारतीय रुपये (Rupee) की वैल्यू पर पड़ने वाले दबाव को कम किया जा सके। निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि यह रोक केवल नए लम्प-सम (lump-sum) निवेश, नई SIP और स्विच-इन पर लागू है। राहत की बात यह है कि पहले से चल रही SIP जारी रहेंगी और निवेशक नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) पर सीधे गोल्ड ईटीएफ (Gold ETF) की खरीद-बिक्री सामान्य रूप से कर सकते हैं।
कीमतों में करेक्शन का दबाव
रेगुलेटरी बदलावों के अलावा, निवेशकों का सेंटीमेंट गोल्ड की कीमतों में आई भारी गिरावट से भी प्रभावित हुआ है। साल 2026 की शुरुआत में अपने रिकॉर्ड हाई से गोल्ड की कीमतें अब करीब 22% से 25% तक नीचे गिर चुकी हैं। इस गिरावट के पीछे ग्लोबल मैक्रोइकोनॉमिक फैक्टर्स का बड़ा हाथ है। डॉलर (US Dollar) की मजबूती और बॉन्ड यील्ड (Bond Yields) में बढ़ोतरी के कारण गोल्ड जैसे नॉन-यील्डिंग एसेट्स का आकर्षण कम हुआ है।
निवेशकों के लिए सलाह
भले ही फंड ऑफ फंड्स के जरिए निवेश का जरिया सीमित हुआ हो, लेकिन गोल्ड की एसेट क्लास के रूप में अहमियत बनी हुई है। फिलहाल मार्केट में ग्लोबल इकोनॉमी के दबाव और स्थानीय रेगुलेटरी कदमों के बीच अनिश्चितता का माहौल है। निवेशकों को सलाह है कि वे इंपोर्ट लेवल और रुपये की स्थिरता पर नजर रखें। जिन लोगों की SIP पहले से चल रही है, उन्हें पैनिक में आने की जरूरत नहीं है, क्योंकि कमोडिटी मार्केट में उतार-चढ़ाव एक सामान्य प्रक्रिया है और लंबी अवधि का नजरिया ही पोर्टफोलियो के लिए बेहतर होता है।
