2025 में सोने की तेजी के कारण (Rally Drivers in 2025)
साल 2025 के दौरान, सोने की कीमतों में कई वैश्विक कारणों से उछाल आया था। पूर्वी यूरोप और पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical uncertainty) ने निवेशकों को सोने की ओर खींचा, क्योंकि इसे एक सुरक्षित निवेश (safe haven) माना जाता है। इसके साथ ही, दुनिया भर के बड़े सेंट्रल बैंकों ने आसान मौद्रिक नीतियां (easy monetary policies) जारी रखीं, जिससे उधार लेने की लागत कम रही और बाजार में लिक्विडिटी (liquidity) काफी अधिक थी। 2025 के दौरान अमेरिकी डॉलर में 10% की गिरावट ने भी अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के लिए सोना सस्ता बना दिया था।
इस दौरान, सेंट्रल बैंकों ने अपनी संपत्ति को पारंपरिक मुद्राओं से हटाकर विविधता लाने की रणनीति भी अपनाई। अमेरिका की बढ़ती वित्तीय चुनौतियों (fiscal pressures) और बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए, भारत के रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India) सहित कई देशों के सेंट्रल बैंकों ने सोने की अपनी होल्डिंग्स में काफी बढ़ोतरी की। पिछले तीन सालों में उन्होंने करीब 1,000 टन सोना खरीदा।
2026 की शुरुआत में गिरावट के कारण (Triggers for Early 2026 Correction)
हालांकि, 2026 की शुरुआत में स्थिति पूरी तरह उलट गई। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव से तेल की कीमतों में इजाफा हुआ, जिससे महंगाई (inflation) बढ़ने की चिंताएं बढ़ीं। अमेरिकी फेडरल रिजर्व (U.S. Federal Reserve) के चेयरमैन जेरोम पॉवेल (Jerome Powell) के बयानों ने संकेत दिया कि ब्याज दरें (interest rates) लंबे समय तक ऊंची बनी रहेंगी। इस रुख ने अमेरिकी बॉन्ड यील्ड (bond yields) को बढ़ाया और डॉलर को मजबूत किया, जिसने सोने की कीमतों पर दबाव डाला।
सोने के फ्यूचर्स (futures) और ईटीएफ (ETFs) में लीवरेज्ड पोजीशन (leveraged positions) को बंद करने (unwinding) से भी कीमतों में आई तेज गिरावट में तेजी आई। मुनाफावसूली (profit-taking) और स्टॉप-लॉस (stop-losses) के ट्रिगर होने से बिकवाली का दबाव और बढ़ गया। तेल प्रवाह (oil flows) में आई रुकावटों ने पश्चिम एशियाई देशों के अधिशेष (surpluses) को भी प्रभावित किया, जिससे सोने में निवेश के लिए पूंजी कम हो सकती थी या बिकवाली करनी पड़ सकती थी।
भारत पर असर (Impact on India's Economy)
भारत, जो सोने का एक प्रमुख उपभोक्ता है, के लिए कीमतों में इस तरह के उतार-चढ़ाव का सीधा आर्थिक असर पड़ता है। 2025 में सोने की ऊंची कीमतों ने भारत के आयात बिल (import bill) को बढ़ाया और घरेलू महंगाई में भी योगदान दिया, क्योंकि वैश्विक स्तर पर ऊंची दरें स्थानीय बाजारों को प्रभावित कर रही थीं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा सोने की लगातार खरीद, इसे एक रिजर्व संपत्ति (reserve asset) के रूप में रणनीतिक भूमिका को दर्शाती है। हालिया गिरावट RBI को और भी बेहतर कीमतों पर सोना खरीदने का मौका दे सकती है।
सोने का भविष्य (The Road Ahead for Gold)
निकट भविष्य में सोने की दिशा काफी हद तक महंगाई के रुझान, लिक्विडिटी और सेंट्रल बैंकों की नीतियों पर निर्भर करेगी। यदि महंगाई ऊंची बनी रहती है, तो लिक्विडिटी टाइट रह सकती है और डॉलर मजबूत बना रह सकता है, जो सोने की बढ़त को सीमित करेगा। इसके विपरीत, यदि महंगाई कम होती है और ब्याज दरें घटाई जाती हैं, तो लिक्विडिटी आसान हो सकती है और डॉलर कमजोर पड़ सकता है, जिससे सोने की अपील बढ़ सकती है। हालांकि, भू-राजनीतिक जोखिमों (geopolitical risks) में कोई भी बड़ी वृद्धि, जो वैश्विक विकास को खतरे में डाले, ब्याज दरों की परवाह किए बिना सोने की मांग को एक सुरक्षित निवेश के तौर पर फिर से बढ़ा सकती है। इस अस्थिरता के बावजूद, अनिश्चितता के खिलाफ एक हेज (hedge) के रूप में सोने का दीर्घकालिक आकर्षण मजबूत बना हुआ है।