वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 23 फरवरी, 2026 को एक अहम बयान में कहा कि भारत में सोने की खपत 'अलार्मिंग प्रोपोर्शन' तक नहीं पहुंची है। उन्होंने जोर दिया कि खरीदारी मुख्य रूप से त्योहारों और शुभ तिथियों जैसे सांस्कृतिक और मौसमी प्रभावों से जुड़ी है, न कि किसी सट्टा-आधारित जुनून से। इस बात पर आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी मुहर लगाते हुए कहा कि भारत के मजबूत बाहरी क्षेत्र (external sector) के कारण सोने के आयात को लेकर फिलहाल कोई मैक्रोइकनॉमिक चिंता नहीं है। इस तरह का नजरिया, सोने की ऊंची वैश्विक कीमतों को लेकर बढ़ रही चिंताओं को शांत करने का एक प्रयास है।
हालांकि, यह आधिकारिक रुख उस जमीनी हकीकत से थोड़ा अलग है, जहां बड़े पैमाने पर सेंट्रल बैंकों द्वारा सोने की खरीदारी और लगातार बनी हुई भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं सोने की कीमतों को एक नई दिशा दे रही हैं। एशिया और पूर्वी यूरोप के सेंट्रल बैंक, डॉलर से इतर अपने रिजर्व को विविध बनाने और महंगाई (inflation) व करेंसी (currency) की अस्थिरता से बचाव के लिए आक्रामक रूप से सोना खरीद रहे हैं। विश्लेषकों का अनुमान है कि 2026 में सोने की कीमतें $4,700 से $6,500 प्रति औंस के बीच रह सकती हैं, और कुछ अनुमान इससे भी ऊपर जाने की बात कर रहे हैं।
इसके विपरीत, भारत के अपने आयात आंकड़े (अप्रैल-दिसंबर 2025) चौंकाने वाले हैं। इस अवधि में सोने के आयात की मात्रा में 18.29% की बड़ी गिरावट देखी गई, जबकि प्रति औंस औसत कीमत 24.62% बढ़ गई। इसके चलते, आयात के कुल मूल्य में केवल 1.83% की मामूली वृद्धि हुई। यह स्पष्ट दर्शाता है कि बढ़ती कीमतों के कारण भौतिक मांग (physical demand) का वॉल्यूम (volume) कम हो रहा है। यह ट्रेंड बताता है कि सांस्कृतिक मांग बनी रहने के बावजूद, यह कीमतों के प्रति संवेदनशील है।
भारत सोने का एक बड़ा उपभोक्ता है और देश के घरों में अनुमानित $5 ट्रिलियन से अधिक का सोना जमा है, जो एक सांस्कृतिक पहचान और बचत का साधन है। निवेश के पैटर्न में बदलाव भी दिख रहा है, जहां गोल्ड ईटीएफ (Gold ETF) में भारी इनफ्लो (inflow) देखा जा रहा है। अकेले जनवरी 2026 में गोल्ड ईटीएफ में आया इनफ्लो, इक्विटी म्यूचुअल फंड इनफ्लो से दोगुना से अधिक रहा। यह दिखाता है कि लोग डिजिटल माध्यमों से भी सोने में निवेश कर रहे हैं। भारत ऐतिहासिक रूप से अपनी 86% सोने की जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, इसलिए घरेलू कीमतें अंतरराष्ट्रीय सोने की वैल्यू और करेंसी उतार-चढ़ाव दोनों के प्रति संवेदनशील बनी रहती हैं।
हालांकि, आधिकारिक बयानों के बावजूद, बाजार के अंतर्निहित कारक कुछ जोखिम भी पेश करते हैं। सेंट्रल बैंकों की लगातार खरीदारी से सोने का मूल्यांकन (valuation) अवास्तविक स्तरों पर पहुंच सकता है। भारत के लिए, ऊंची वैश्विक कीमतों के साथ किसी भी भविष्य की रुपये की गिरावट (rupee depreciation) से आयात बिल, चालू खाता घाटा (current account deficit) और मुद्रास्फीति (inflationary pressures) को लेकर चिंताएं फिर बढ़ सकती हैं। घरों में रखे भौतिक सोने का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 75-80% ज्वेलरी के रूप में) काफी हद तक अचल (illiquid) है और सीधे तौर पर उत्पादक आर्थिक निवेश में योगदान नहीं कर रहा है, जो आर्थिक विकास के लिए एक संरचनात्मक चुनौती है।
विश्लेषकों का अनुमान है कि 2026 के दौरान सोने की कीमतों में मजबूती बनी रहेगी, क्योंकि सेंट्रल बैंकों की मांग, भू-राजनीतिक जोखिम और वैश्विक मौद्रिक नीति में नरमी की उम्मीदें इसके समर्थन में हैं। ऐसे में सोना पोर्टफोलियो डाइवर्सिफिकेशन (portfolio diversification) और महंगाई से बचाव (inflation hedging) के लिए एक रणनीतिक संपत्ति बना रहेगा। हालांकि, बाजार में संभावित अस्थिरता की भी उम्मीद है।