अंतरराष्ट्रीय यूरिया की कीमतें जून में गिरकर **$572 प्रति टन** हो गईं, जिससे खरीफ बुवाई के मौसम में भारत के उर्वरक सब्सिडी बिल में कुछ राहत मिली है। हालांकि, डीएपी (DAP) और पोटाश जैसे अन्य उर्वरकों की ऊंची कीमतें सरकार के लिए चुनौती बनी हुई हैं।
Detailed Coverage
वैश्विक यूरिया की कीमतों में आई नरमी
वैश्विक यूरिया की कीमतों में हालिया उछाल के बाद अब नरमी आई है, जिससे भारतीय उर्वरक क्षेत्र को वित्तीय राहत मिली है। मई में ऊंची कीमतों पर पहुंचने के बाद, जून में अंतरराष्ट्रीय यूरिया की कीमतें घटकर $572 प्रति टन रह गईं, जो 40% की गिरावट दर्शाता है। यह कमी ऐसे समय पर आई है जब घरेलू कृषि क्षेत्र के लिए खरीफ बुवाई का मुख्य मौसम शुरू हो रहा है और आवश्यक पोषक तत्वों की मांग अपने चरम पर होती है।
आपूर्ति में सुधार का असर
कीमतों में यह गिरावट मुख्य रूप से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आए बदलावों के कारण है। चीन, जो यूरिया का एक प्रमुख उत्पादक है, ने अपने निर्यात प्रतिबंधों में ढील दी है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया का प्रवाह बेहतर हुआ है। इसके अलावा, पश्चिम एशिया में ऊर्जा लागत और शिपिंग में व्यवधान को लेकर जो चिंताएं थीं, वे भी अब कम हो रही हैं। हालांकि $572 प्रति टन की यह कीमत मई की तुलना में एक महत्वपूर्ण गिरावट है, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि पिछले साल जून में $395 प्रति टन की तुलना में वैश्विक यूरिया की कीमतें अभी भी लगभग 45% अधिक हैं।
अन्य पोषक तत्वों की चुनौती
हालांकि यूरिया की कीमतों में नरमी आई है, लेकिन उर्वरक उद्योग अभी भी लागत के दबाव का सामना कर रहा है। सरकार को एक बड़े सब्सिडी बिल का प्रबंधन करना पड़ रहा है क्योंकि अन्य महत्वपूर्ण पोषक तत्वों की लागत अभी भी ऊंची बनी हुई है। विशेष रूप से, सल्फर की कीमत पिछले वर्ष की तुलना में 265% बढ़ गई है, जबकि अमोनिया की कीमतों में लगभग दोगुनी वृद्धि हुई है। डाइअमोनियम फॉस्फेट (DAP) और म्यूरेट ऑफ पोटाश (Muriate of Potash) सहित अन्य उर्वरक भी ऊंची कीमतों पर कारोबार कर रहे हैं। चूंकि भारत लगभग अपनी सारी पोटाश और फॉस्फेटिक उर्वरकों की कच्ची सामग्री का आयात करता है, इसलिए ये ऊंची वैश्विक कीमतें सरकार के कुल सब्सिडी खर्च पर दबाव बनाए रखती हैं।
घरेलू उपलब्धता और भविष्य का दृष्टिकोण
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मई और जून में घरेलू उत्पादन लक्ष्य से अधिक रहा है, जिसने कुछ स्थिरता प्रदान की है। इससे किसानों को मौजूदा खरीफ मौसम के लिए पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने में मदद मिली है। हालांकि, फॉस्फेटिक और पोटाशिक उर्वरकों के आयात पर निर्भरता का मतलब है कि भारत की उर्वरक लागत अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव और मुद्रा में अस्थिरता के प्रति संवेदनशील बनी हुई है। निवेशकों और बाजार विश्लेषकों को वैश्विक कमोडिटी रुझानों और ऊर्जा मूल्य निर्धारण में संभावित परिवर्तनों की निगरानी करनी चाहिए, क्योंकि ये कारक आने वाले महीनों में सरकार के लिए अंतिम सब्सिडी बोझ तय करेंगे। देश किसानों के लिए किफायती उर्वरकों की आवश्यकता और राष्ट्रीय राजकोषीय सब्सिडी बजट के प्रबंधन के बीच संतुलन बनाते हुए, घरेलू आपूर्ति श्रृंखला की स्थिरता एक प्रमुख केंद्र बिंदु बनी रहेगी।
