इंटरनेशनल मार्केट में चावल की कीमतें साल 2027 तक ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती हैं। इसकी मुख्य वजह 'सुपर' एल नीनो (El Niño) है, जिसने खेती के चक्र को बिगाड़ दिया है और एक दशक में पहली बार ग्लोबल प्रोडक्शन में गिरावट दर्ज की गई है।
ग्लोबल सप्लाई का बिगड़ा गणित
'सुपर' एल नीनो के असर से भारत, थाईलैंड और वियतनाम जैसे प्रमुख उत्पादक देशों में फसल चक्र बुरी तरह प्रभावित हुआ है। आंकड़ों पर नजर डालें तो 2026-27 सीजन के लिए ग्लोबल राइस प्रोडक्शन में 1.4% से लेकर 2.4% तक की गिरावट का अनुमान है। यह पिछले 10 सालों में पहली बार है जब उत्पादन में इतनी बड़ी कमी आ रही है।
बड़े संस्थानों का अनुमान
वर्ल्ड बैंक (World Bank) की रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 में चावल की कीमतों में 9.8% की बढ़ोतरी के बाद 2027 में यह 11.6% तक और बढ़ सकती हैं। वहीं, BMI (Fitch Solutions) का विश्लेषण बताता है कि रफ राइस फ्यूचर्स (Rough Rice Futures) की औसत कीमत $16.50 प्रति हंड्रेडवेट तक रह सकती है, जो मार्केट में बनी रहने वाली वोलाटिलिटी की ओर इशारा करती है।
बढ़ती औद्योगिक मांग और नीतिगत जोखिम
चावल की कीमतों को सिर्फ मौसम ही नहीं, बल्कि इंडस्ट्रियल डिमांड भी बढ़ा रही है। इथेनॉल और एनिमल फीड बनाने में ब्रोकन राइस (Broken Rice) का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है, जिससे खाने वाले चावल की सप्लाई पर दबाव बढ़ गया है।
निवेशकों के लिए सबसे बड़ा रिस्क सरकारी हस्तक्षेप (Government Intervention) है। भारत समेत प्रमुख निर्यातक देशों में बढ़ती महंगाई को थामने के लिए सरकारें एक्सपोर्ट पर और पाबंदियां या बैन लगा सकती हैं। ऐसी किसी भी नीतिगत बदलाव का सीधा असर एग्री-एक्सपोर्ट कंपनियों के मार्जिन और रिवेन्यू पर पड़ सकता है। आने वाले समय में निवेशकों को एल नीनो के अपडेट्स, एक्सपोर्ट पॉलिसी और घरेलू मांग-आपूर्ति के आंकड़ों पर करीबी नजर रखनी होगी।
