अल नीनो (El Nino) के चलते ग्लोबल चावल प्रोडक्शन में **90 लाख टन** की गिरावट की आशंका है। 2026-27 सीज़न में उत्पादन घटकर **53.64 करोड़ टन** रहने का अनुमान है। एक्सपोर्ट वॉल्यूम भले ही मौजूदा स्टॉक से संभल जाए, लेकिन इम्पोर्ट डिमांड में बढ़ोतरी सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ा रही है।
अल नीनो का प्रोडक्शन पर असर
अल नीनो (El Nino) का लगातार बना रहना इस गिरावट का सबसे बड़ा कारण है। यूएस नेशनल ओशनिक एंड एटमोस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) के मुताबिक, 2027 की शुरुआत तक अल नीनो की स्थिति बने रहने की 97% संभावना है। यह मौसम का पैटर्न भारत, पाकिस्तान, थाईलैंड, वियतनाम और चीन जैसे प्रमुख चावल उत्पादक देशों में फसल की बुवाई और विकास को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है।
खराब मौसम और बढ़ती लागत के चलते 2026-27 के लिए ग्लोबल चावल प्रोडक्शन 53.64 करोड़ टन रहने का अनुमान है। भारतीय राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (Indian Rice Exporters Federation) और एसएंडपी ग्लोबल एनर्जी (S&P Global Energy) के एनालिसिस के अनुसार, कुल प्रोडक्शन में करीब 90 लाख टन की कमी आ सकती है।
मौसम से फसल को होने वाले नुकसान के अलावा, किसान बढ़ती इनपुट लागत से भी जूझ रहे हैं। फर्टिलाइजर, फ्यूल और ट्रांसपोर्टेशन के दाम बढ़ गए हैं। यह स्थिति पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनावों के कारण और भी गंभीर हो गई है। ऐसे में, आने वाले सीज़न में सप्लाई और भी टाइट हो सकती है।
ट्रेड और मार्केट का आउटलुक
प्रोडक्शन में कमी के बावजूद, पिछले सीज़न (2025-26) के भारी कैरी-ओवर स्टॉक की वजह से ग्लोबल एक्सपोर्ट वॉल्यूम स्थिर रहने की उम्मीद है। हालांकि, इंपोर्ट डिमांड में करीब 40 लाख टन की बढ़ोतरी होकर यह 5.97 करोड़ टन तक पहुंच सकती है।
निवेशकों के लिए यह स्थिति मिली-जुली है। दाम बढ़ने से निर्यातकों को प्रति टन बेहतर रियलाइजेशन मिल सकता है। लेकिन, भारतीय राइस एक्सपोर्टर्स को ऑपरेशनल जोखिमों से भी निपटना होगा। इनपुट कॉस्ट में बढ़ोत्तरी से प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बना हुआ है। साथ ही, अगर डोमेस्टिक कीमतें बढ़ीं, तो सरकार द्वारा एक्सपोर्ट पर बैन या पॉलिसी में बदलाव का भी खतरा बना रहेगा।
आगे क्या?
इस बीच, दिल्ली में 24 अक्टूबर को होने वाले भारत इंटरनेशनल राइस कॉन्फ्रेंस (Bharat International Rice Conference) में बाजार के पार्टिसिपेंट्स को और भी अहम जानकारी मिलने की उम्मीद है। यहां ट्रेड फ्लो पर इन जोखिमों के प्रभाव को स्पष्ट किया जाएगा और आने वाले 52 हफ्तों के लिए प्राइस प्रॉस्पेक्ट्स की तस्वीर साफ होगी। निवेशकों को सरकारी नीतियों, ग्लोबल सप्लाई-डिमांड ट्रेंड्स और इनपुट कॉस्ट पर नज़र रखनी होगी।
