दुनिया भर में डीजल और गैसोलीन जैसे रिफाइंड प्रोडक्ट्स की **1.8 मिलियन बैरल** प्रति दिन की कमी दर्ज की गई है। अमेरिका में रिफाइनरीज अपनी **97.4%** क्षमता पर काम कर रही हैं, लेकिन सप्लाई चेन में जारी संकट के कारण भारतीय कंपनियों के लिए चुनौतियां बढ़ गई हैं।
ग्लोबल एनर्जी मार्केट इस समय एक अजीब स्थिति से गुजर रहा है। कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें जहां एक दायरे में बनी हुई हैं, वहीं रिफाइंड प्रोडक्ट्स जैसे डीजल, पेट्रोल और जेट फ्यूल की भारी किल्लत देखी जा रही है। अगस्त 2026 के अंत तक, ग्लोबल मार्केट में 1.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन का घाटा चल रहा है, जो सर्दियों की मांग से पहले चिंता का विषय है।
संकट की असली वजह
इस असंतुलन की मुख्य वजह रशियन रिफाइनिंग सेंटर्स पर हमले और मिडिल ईस्ट में जारी शिपिंग रुकावटें हैं। इन गैप्स को भरने के लिए अमेरिकी रिफाइनरीज अपनी क्षमता का 97.4% इस्तेमाल कर रही हैं, जो इस साल का रिकॉर्ड स्तर है। बावजूद इसके, अमेरिका में डिस्टिलेट इन्वेंट्री अपने 5 साल के औसत से 14% नीचे बनी हुई है।
भारतीय कंपनियों पर असर
Reliance Industries, Indian Oil Corp, BPCL, HPCL और Chennai Petroleum जैसे बड़े नामों पर इस ग्लोबल ट्रेंड का सीधा असर पड़ता है। बाजार में रिफाइंड प्रोडक्ट्स की किल्लत से आमतौर पर ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन्स बढ़ते हैं, जो इन कंपनियों के मुनाफे के लिए फायदेमंद होते हैं। लेकिन, सिक्का का दूसरा पहलू भी है। रिफाइनरीज के अपनी अधिकतम क्षमता पर चलने से तकनीकी खराबी और अनप्लांड शटडाउन का रिस्क बढ़ जाता है। साथ ही, रेड सी (Red Sea) में बढ़ते शिपिंग इंश्योरेंस प्रीमियम और लॉजिस्टिक देरी भारतीय रिफाइनर्स के मार्जिन को दबाव में ला सकती है।
निवेशकों के लिए क्या है महत्वपूर्ण?
निवेशकों को अब 'क्रैक स्प्रेड' (Crack Spread) पर बारीक नजर रखनी चाहिए, जो क्रूड ऑयल और रिफाइंड प्रोडक्ट्स के बीच का अंतर है। अगर यह स्प्रेड चौड़ा रहता है, तो रिफाइनर्स के लिए बेहतर है। हालांकि, भारत की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के लिए स्थिति थोड़ी पेचीदा है, क्योंकि ग्लोबल स्तर पर कीमतें बढ़ने के बावजूद घरेलू महंगाई को नियंत्रित रखने के लिए रिटेल फ्यूल प्राइसेज पर सरकार का दबाव रहता है। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि क्या रिफाइनरीज इस दबाव को झेल पाती हैं और सर्दियों के सीजन में क्रैक स्प्रेड का ट्रेंड क्या रुख लेता है।
