दुनिया भर के तेल भंडारों में भारी गिरावट आई है। फरवरी **2026** से अब तक कुल **50.7 करोड़** बैरल तेल का इस्तेमाल हो चुका है, जिससे सप्लाई और डिमांड के बीच खाई चौड़ी हो गई है और कीमतों में अस्थिरता का डर बढ़ गया है।
ग्लोबल एनर्जी मार्केट एक बेहद मुश्किल दौर से गुजर रहा है। फरवरी 2026 में शुरू हुए संघर्ष के बाद से दुनिया भर के देशों ने अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए 50.7 करोड़ बैरल तेल का उपयोग किया है। समस्या यह है कि बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान और क्षेत्रीय तनाव के कारण नया प्रोडक्शन डिमांड की रफ्तार के साथ कदम नहीं मिला पा रहा है।
क्यों बढ़ रहा है यह संकट?
इस सप्लाई स्क्वीज (Supply Squeeze) की मुख्य वजह दुनिया के प्रमुख ट्रेड रूट्स और चोकपॉइंट्स पर जारी तनाव है। 'Strait of Hormuz' और 'Bab el-Mandeb' जैसे रास्तों पर लगातार बाधाओं के कारण टैंकरों की आवाजाही मुश्किल हो गई है। अनुमान है कि 2026 में ग्लोबल ऑयल सप्लाई पिछले साल के मुकाबले 57 लाख बैरल प्रति दिन कम रह सकती है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
इतिहास गवाह है कि तेल का स्टॉक एक 'शॉक एब्जॉर्बर' (Shock Absorber) की तरह काम करता है, जो कीमतों को स्थिर रखता है। एनालिस्ट्स का मानना है कि अगले 6 से 9 महीनों में हम एक 'क्रिटिकल थ्रेशोल्ड' तक पहुंच सकते हैं, जहां तेल का यह सुरक्षा घेरा खत्म हो जाएगा। यदि ऐसा हुआ, तो मार्केट को कीमतों में भारी उछाल के जरिए डिमांड को जबरन कम करना पड़ेगा।
फिलहाल, कच्चा तेल $100 प्रति बैरल के आसपास या उससे ऊपर बना हुआ है। मैन्युफैक्चरिंग, ट्रांसपोर्ट और रिटेल जैसे सेक्टर्स पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। अगर जल्द ही प्रोडक्शन रिकवरी नहीं हुई, तो ग्लोबल इकोनॉमिक ग्रोथ पर इसका गहरा असर देखने को मिल सकता है।
