तेल की महंगाई का 'इम्पोर्टेड' झटका, RBI की मुश्किल बढ़ी
मध्य पूर्व में जारी तनाव और हमलों की ख़बरों ने ग्लोबल एनर्जी मार्केट्स में हलचल मचा दी है. ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude Oil) की कीमतें $82 प्रति बैरल के पार जाकर $77 के करीब कारोबार कर रही हैं. भारत जैसे तेल इम्पोर्ट करने वाले देशों के लिए, यह सीधा झटका है, जिसका असर अब डोमेस्टिक बॉन्ड मार्केट पर दिख रहा है.
बॉन्ड यील्ड में तेज़ी, 6.70% के ऊपर पहुंचा स्तर
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने ग्लोबल फाइनेंशल मार्केट्स में घबराहट बढ़ा दी है. इस वजह से, जो 10-वर्षीय भारतीय सरकारी बॉन्ड यील्ड (Benchmark 10-year Indian government bond yield) पहले 6.6601% के आसपास थी, वह 2 मार्च 2026 को तेज़ी से बढ़कर 6.7042% पर पहुँच गई. बॉन्ड की कीमतों में गिरावट का मतलब है कि अब सरकार और कंपनियों को उधार लेने के लिए ज़्यादा ब्याज चुकाना पड़ेगा. साथ ही, 'इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन' (आयातित महंगाई) का ख़तरा भी बढ़ गया है. MUFG के एनालिस्ट्स का मानना है कि अगर तेल की कीमतें ज़्यादा बनी रहीं, तो भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) बढ़ सकता है, जिससे RBI के लिए ब्याज दरें घटाना मुश्किल हो जाएगा. बॉन्ड एक्सपर्ट वेंकटकृष्णन श्रीनिवासन का कहना है कि बैंकों के लिए सरकारी बॉन्ड यील्ड 6.70% के ऊपर जाने पर ट्रेजरी लॉस (Treasury Loss) का सामना करना पड़ सकता है, इसलिए इस स्तर पर ज़्यादा बढ़त की उम्मीद कम है.
RBI के सामने 'पॉलिसी कंंड्रम'
भले ही बाहरी झटकों से बॉन्ड यील्ड पर दबाव है, भारत की डोमेस्टिक इन्फ्लेशन (महंगाई) अभी भी काबू में है. जनवरी 2026 में कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) इन्फ्लेशन 2.75% था, जो RBI के 2-4% के टारगेट बैंड में है. जुलाई-सितंबर 2025 तिमाही में करंट अकाउंट डेफिसिट भी घटकर GDP का 1.3% रह गया था. ये हालात तेल की कीमतों में तेज़ी से आने वाले 'इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन' के ख़तरे के बिलकुल विपरीत हैं. ऐतिहासिक रूप से, क्रूड ऑयल में $10 प्रति बैरल की बढ़ोतरी से रिटेल इन्फ्लेशन में 0.2% और होलसेल इन्फ्लेशन में 0.5% की बढ़त देखी जाती है. RBI ने फरवरी 2026 की मोनिटरी पॉलिसी में ब्याज दरों को 5.25% पर स्थिर रखते हुए न्यूट्रल (Neutral) रुख बनाए रखा था, जिसका मकसद ग्रोथ को सपोर्ट करना था. लेकिन, अब बढ़ते भू-राजनीतिक हालात और तेल की कीमतों पर इसका असर, RBI को अपनी इस पॉलिसी पर दोबारा विचार करने पर मजबूर कर सकता है, जिससे रेट कट (Rate Cut) में देरी हो सकती है. बाज़ार पहले भी ऐसे ही भू-राजनीतिक चिंताओं के चलते यील्ड में तेज़ी देख चुका है.
आगे क्या हो सकता है?
सबसे बड़ा ख़तरा यह है कि क्या तेल की मौजूदा कीमतें बनी रहेंगी. अगर मध्य पूर्व का तनाव और बढ़ता है, तो क्रूड ऑयल लंबे समय तक महंगा रह सकता है. भारत के लिए, यह 'इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन' का झटका CPI को RBI के टॉलरेंस बैंड की ऊपरी सीमा तक ले जा सकता है या उसे पार भी करा सकता है. अगर महंगाई का डर बढ़ता है, तो RBI को ग्रोथ सपोर्ट के बजाय महंगाई रोकने पर ध्यान देना पड़ सकता है, जिसके लिए उसे सख्त मोनिटरी पॉलिसी अपनानी पड़ सकती है. यह RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा के मार्च 2026 की शुरुआत में दिए उस बयान के विपरीत होगा, जिसमें उन्होंने कहा था कि इंटरेस्ट रेट्स (Interest Rates) स्थिर रह सकते हैं या कम हो सकते हैं. भारत अपनी ज़रूरतों का आधे से ज़्यादा तेल मध्य पूर्व से मंगाता है, ऐसे में सप्लाई में बाधा और कीमतों में तेज़ी से यह और भी ज़्यादा संवेदनशील हो जाता है. लंबे समय तक ऊंचे तेल की कीमतों से करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ सकता है, जो रुपए पर दबाव डाल सकता है और इम्पोर्ट्स (Imports) को महंगा कर सकता है, जिससे महंगाई और बढ़ेगी. इस स्थिति में, RBI के पास ब्याज दरें घटाने की गुंजाइश बहुत कम हो जाएगी और शायद पॉलिसी को टाइट करना पड़े.
भविष्य का नज़रिया
फिलहाल, बाज़ार की नज़र तेल की कीमतों की दिशा और RBI के अगले कदम पर होगी. भले ही बाज़ार 6.70% के आसपास यील्ड में कुछ रेजिस्टेंस (Resistance) की उम्मीद कर रहा हो, लेकिन लगातार भू-राजनीतिक अस्थिरता इन तकनीकी स्तरों को तोड़ सकती है. RBI की अप्रैल में होने वाली मोनिटरी पॉलिसी मीटिंग में इस बात पर पैनी नज़र रखी जाएगी कि सेंट्रल बैंक महंगाई का आकलन कैसे करता है और क्या प्रतिक्रिया देता है. मौजूदा माहौल में, RBI को 'इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन' के खतरे और डोमेस्टिक ग्रोथ को सपोर्ट करने के बीच एक नाजुक संतुलन बनाना होगा.