GTRI की सलाह: रूस से तेल खरीदना जारी रखे भारत, अमेरिका के टैरिफ का न करें डर

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
GTRI की सलाह: रूस से तेल खरीदना जारी रखे भारत, अमेरिका के टैरिफ का न करें डर

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इंस्टीट्यूट (GTRI) ने भारत को सलाह दी है कि वह रूस से कच्चा तेल आयात जारी रखे, भले ही अमेरिका संभावित टैरिफ की धमकी दे रहा हो। यह कदम भारत की ऊर्जा सुरक्षा और महंगाई को काबू में रखने के लिए ज़रूरी है। निवेशकों को इस पर नज़र रखनी चाहिए कि यह कूटनीतिक बदलाव ईंधन की कीमतों और भारतीय तेल कंपनियों के आयात बिल को कैसे प्रभावित करता है।

रूस से तेल आयात क्यों ज़रूरी?

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इंस्टीट्यूट (GTRI) ने भारत को एक अहम सलाह दी है - रूस से कच्चा तेल आयात जारी रखें, भले ही अमेरिका इस पर टैरिफ लगाने की धमकी दे रहा हो। अमेरिकी सीनेट में एक ऐसा बिल पेश हुआ है जिससे राष्ट्रपति को उन देशों पर भारी टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है जो रूस से तेल और गैस खरीदते हैं।

भारतीय बाज़ार के लिए रूस का तेल

वित्तीय वर्ष 2026 में, रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल सप्लायर बन गया था। भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 30.3% हिस्सा रूस से आया, जिसका मूल्य $40.8 बिलियन था। यह कुल आयात बिल $134.7 बिलियन का एक बड़ा हिस्सा था। रूस से सस्ते दामों पर तेल मिलना भारतीय ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के लिए लागत कम रखने में बहुत मददगार रहा है और इसने घरेलू महंगाई को नियंत्रित रखने में भी सरकार की मदद की है।

ट्रेड और रेगुलेटरी रिस्क

अमेरिकी बिल के तहत, रूस से एनर्जी खरीदने वाले टॉप पांच देशों की हर 180 दिन में समीक्षा की जाएगी। इसमें भारत, चीन, हंगरी और स्लोवाकिया जैसे देश शामिल हो सकते हैं। GTRI का मानना है कि भारत को अपनी कूटनीतिक स्वायत्तता और आर्थिक हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए। इसलिए, इन भू-राजनीतिक दबावों से निपटने के लिए भारत को तुरंत अपनी ट्रेड पॉलिसी में बदलाव करने के बजाय कूटनीतिक बातचीत का रास्ता अपनाना चाहिए।

भारतीय बाज़ारों पर असर

एनर्जी और पेट्रोलियम सेक्टर के निवेशकों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि आयात नीति में बदलाव से कंपनियों के मुनाफे पर क्या असर पड़ सकता है। अगर भारत को रूस के सस्ते तेल की जगह मध्य पूर्व या अन्य महंगे स्रोतों की ओर रुख करना पड़ा, तो राष्ट्रीय आयात बिल बढ़ सकता है और सरकारी तेल कंपनियों पर मार्जिन का दबाव आ सकता है। इसके अलावा, अमेरिकी बिल में रूस के साथ एनर्जी ट्रेड में शामिल वित्तीय और शिपिंग कंपनियों पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है। लॉजिस्टिक्स या बैंकिंग चैनलों पर किसी भी तरह की रोक से भारतीय आयातकों के लिए ऑपरेशनल कॉम्प्लेक्सिटी और लागत बढ़ सकती है। अगला महत्वपूर्ण अपडेट यह होगा कि यह बिल अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में कैसे आगे बढ़ता है और क्या इसे राष्ट्रपति की अंतिम मंजूरी मिलती है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.