ग्लोबल मार्केट में भूचाल: कच्चे तेल में तूफानी तेजी
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें आसमान छू रही हैं। सोमवार, 9 मार्च 2026 को ब्रेंट क्रूड $119 प्रति बैरल के पार निकल गया, जबकि WTI फ्यूचर्स भी इसी के करीब कारोबार कर रहा है। यह 2022 के बाद की सबसे बड़ी अस्थिरता है। इस उछाल की मुख्य वजह अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच गहराता तनाव है। बाज़ार इस बात की चिंता में है कि कहीं होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) बंद न हो जाए, जो दुनिया के करीब 20% तेल और LNG व्यापार का अहम रास्ता है। जानकारों का कहना है कि इस कीमत वृद्धि में भू-राजनीतिक जोखिम (geopolitical risk premium) का बड़ा हाथ है।
G7 देशों की तेल भंडार निकासी की योजना
इस स्थिति से निपटने के लिए, G7 देशों के वित्त मंत्री अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के साथ मिलकर आपातकालीन तेल भंडार से 300 से 400 मिलियन बैरल तक तेल निकालने पर चर्चा करने वाले हैं। अमेरिका समेत 3 G7 देशों का इस कदम को समर्थन है। इसका मकसद ऊर्जा बाज़ार को स्थिर करना और महंगाई को काबू करना है। इतिहास गवाह है कि ऐसी सामूहिक निकासी से कीमतों को कुछ $10-20 तक नीचे लाने में मदद मिली है, जैसा कि 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद हुआ था। हालांकि, यह देखना बाकी है कि यह कदम सप्लाई की गहरी कमी को कितनी प्रभावी ढंग से दूर कर पाएगा, खासकर जब रिफाइनिंग क्षमता भी सीमित है।
भारत का अपना अलग रास्ता
खास बात यह है कि भारत, जो खुद एक बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है, G7 की इस योजना में शामिल नहीं होगा। G7 या IEA का सदस्य न होने के नाते, भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए स्वतंत्र रणनीति बना रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत के पास करीब 74 दिनों का कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद का स्टोरेज है। लेकिन कुछ अन्य रिपोर्टें बताती हैं कि असल में यह 25 दिनों के कच्चे तेल और 25 दिनों के रिफाइंड उत्पादों तक सीमित है, जो इसे सप्लाई झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है। चीन के मुकाबले, जिसके पास कहीं ज़्यादा बड़ा भंडार है, भारत की स्थिति थोड़ी नाजुक कही जा सकती है। भारत अपनी रणनीति के तहत आयात के स्रोत बढ़ाने और कूटनीतिक रास्ते तलाशने पर जोर दे रहा है।
बाज़ार का मिजाज और विश्लेषकों का नज़रिया
2026 की शुरुआत से ही ऊर्जा क्षेत्र बाज़ार में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाला साबित हो रहा है। 6 मार्च 2026 तक S&P 500 Energy Sector इंडेक्स में काफी मजबूती दिखी है, जिसका फॉरवर्ड P/E रेशियो 20.82 है। एनर्जी ETFs जैसे XLE भी मजबूत संकेत दे रहे हैं। हालांकि, विश्लेषकों की राय बंटी हुई है। कुछ 2026 में कीमतें गिरने की उम्मीद कर रहे हैं, वहीं दूसरे भू-राजनीतिक जोखिमों को देखते हुए पूर्वानुमानों को बढ़ा रहे हैं। ING ने इन जोखिमों के कारण ICE Brent 2026 के लिए औसत मूल्य पूर्वानुमान को $62/bbl कर दिया है। IMF का अनुमान है कि कच्चे तेल में $10 प्रति बैरल की बढ़ोतरी से वैश्विक महंगाई में 0.4% अंक की बढ़त हो सकती है।
जोखिम और आगे का रास्ता
जानकारों का मानना है कि G7 की भंडार निकासी की योजना केवल एक मनोवैज्ञानिक उपाय साबित हो सकती है, न कि मौजूदा संकट का स्थायी समाधान। अगर अमेरिका-ईरान संघर्ष लंबा खिंचता है, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते सप्लाई बाधित होती है, तो कीमतें ऊंची बनी रह सकती हैं। इससे महंगाई और वैश्विक आर्थिक विकास पर दबाव बढ़ेगा। भारत का अपना छोटा भंडार इसे और भी जोखिम में डालता है। भंडार से निकासी कीमतों को अस्थायी रूप से कम कर सकती है, लेकिन यह सप्लाई की वास्तविक कमी या भू-राजनीतिक नाकाबंदी को दूर नहीं कर सकती। यह संकेत देता है कि कीमतों में यह उछाल केवल शुरुआत हो सकती है। G7 के कदम को बाज़ार का पर्याप्त समर्थन न मिलने पर और भी अनिश्चितता बढ़ सकती है।