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Food Prices Alert: एनर्जी क्राइसिस से महंगाई का डबल अटैक, खाने-पीने की चीज़ें हुईं महंगी!

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Food Prices Alert: एनर्जी क्राइसिस से महंगाई का डबल अटैक, खाने-पीने की चीज़ें हुईं महंगी!
Overview

मार्च के महीने में दुनिया भर में फूड कमोडिटी की कीमतों में लगातार दूसरे महीने उछाल देखा गया। FAO फूड प्राइस इंडेक्स **2.4%** बढ़कर **128.5** पॉइंट पर पहुँच गया, जो पिछले साल की तुलना में **1%** ज़्यादा है। इस बढ़त का मुख्य कारण एनर्जी की कीमतों में आई जबरदस्त तेजी थी, जो जियोपॉलिटिकल टेंशन से जुड़ी हुई है।

एनर्जी क्राइसिस ने बढ़ाई Food Prices की आग

FAO फूड प्राइस इंडेक्स मार्च 2026 में 128.5 अंकों पर पहुँच गया, जो फरवरी की तुलना में 2.4% और पिछले साल इसी अवधि की तुलना में 1% ज़्यादा था। इस बड़ी उछाल की मुख्य वजह एनर्जी की कीमतों में आई भारी बढ़ोतरी रही। खासकर, मध्य पूर्व (Near East) में बढ़ते जियोपॉलिटिकल टेंशन के चलते कच्चे तेल (Crude Oil) के दाम Brent में $112 प्रति बैरल के पार निकल गए, जो एक रिकॉर्ड मंथली गेन था। WTI में भी सप्लाई में रुकावट की आशंकाओं के चलते तेजी देखी गई। इस एनर्जी शॉक का असर ग्लोबल सप्लाई चेन पर पड़ा है, जिससे न सिर्फ क्रूड ऑयल बल्कि नेचुरल गैस और रिफाइंड प्रोडक्ट्स की कीमतें भी बढ़ी हैं।

किसानों पर Input Costs का भारी बोझ

एनर्जी क्राइसिस का सीधा असर किसानों पर भी पड़ रहा है, जिनके लिए जरूरी इनपुट कॉस्ट्स आसमान छू रही हैं। इंटरनेशनल फर्टिलाइजर की कीमतें तेज़ी से बढ़ी हैं। यूरिया की कीमतें फरवरी के अंत से लगभग 50% बढ़कर $400-$490 प्रति मीट्रिक टन से करीब $700 तक पहुँच गईं। DAP और MAP फर्टिलाइजर 30% से ज़्यादा महंगे हुए। खास नाइट्रोजन फर्टिलाइजर की कीमतों में मार्च में डबल-डिजिट की मासिक बढ़ोतरी देखी गई, जहाँ यूरिया $674/टन पर पहुँचा और एनहाइड्रस फर्टिलाइजर $1,000/टन के पार निकल गया, जो एक साल में पहली बार है। फर्टिलाइजर के मुख्य घटक, यानी नेचुरल गैस की बढ़ी हुई लागतें किसानों के मुनाफे पर भारी पड़ रही हैं। कई किसानों को 2026 में प्रति एकड़ प्रोडक्शन कॉस्ट में बढ़ोतरी की उम्मीद है, जिसका मुख्य कारण फर्टिलाइजर का खर्चा है, भले ही फ्यूल और इंटरेस्ट जैसी कुछ लागतें थोड़ी कम हो सकती हैं।

प्रमुख Food Commodities पर दबाव

एनर्जी और इनपुट कॉस्ट्स का दबाव अलग-अलग फूड कमोडिटीज को अलग-अलग तरह से प्रभावित कर रहा है। वेजिटेबल ऑयल की कीमतें मार्च में 5.1% बढ़ीं, जिसका सीधा असर क्रूड ऑयल पर भी दिखा। पाम ऑयल की कीमतें बढ़ीं और सोयाबीन ऑयल फ्यूचर्स कई सालों के अपने उच्चतम स्तर पर पहुँच गए, क्योंकि बढ़ी हुई एनर्जी कॉस्ट्स ने बायोफ्यूल मार्जिन को बेहतर बनाया। चीनी की कीमतों में 7.2% का उछाल आया, आंशिक रूप से इसलिए क्योंकि ब्राजील एनर्जी मार्केट में ज़्यादा इथेनॉल प्रोडक्शन के लिए गन्ने का इस्तेमाल कर सकता है। हालांकि, ब्राजील की 2026/27 क्रॉप ईयर के लिए चीनी उत्पादन में गिरावट का अनुमान है, जिससे ग्लोबल सप्लाई टाइट हो सकती है। सीरियल (Cereal) की कीमतों में 1.5% की मामूली बढ़ोतरी हुई, जिसमें गेहूं की कीमतों में 4.3% का इजाफा हुआ। इसकी वजह अमेरिका के मैदानी इलाकों में सूखे की आशंका और ऑस्ट्रेलिया में कम बुवाई की उम्मीदें हैं, जिन्हें फर्टिलाइजर की ज़्यादा लागतों ने और बिगाड़ दिया है। वहीं, चावल की कीमतों में इंपोर्ट डिमांड कमजोर होने से 3.0% की गिरावट आई।

भविष्य की सप्लाई को लेकर बढ़ता जोखिम

फिलहाल ग्लोबल सीरियल सप्लाई तो भरपूर है, जो तात्कालिक कमी के खिलाफ एक बफर प्रदान करती है। लेकिन, इनपुट की ऊंची लागतें भविष्य की फूड सप्लाई के लिए एक बड़ा और अक्सर अनदेखा किया जाने वाला जोखिम पैदा कर रही हैं। इकोनॉमिस्ट्स का मानना है कि अगर फर्टिलाइजर की कीमतें ज़्यादा बनी रहीं, तो किसान इनका कम इस्तेमाल कर सकते हैं, कम रकबे में बुवाई कर सकते हैं या फसलें बदल सकते हैं, जिससे भविष्य में यील्ड्स कम हो सकती हैं और सप्लाई टाइट हो सकती है। कई फार्म 2026 सीजन के लिए घाटे का अनुमान लगा रहे हैं, क्योंकि प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ रही है और कमोडिटी की कीमतें पर्याप्त नहीं हैं। हॉरमुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से जुड़ी जियोपॉलिटिकल अस्थिरता सप्लाई चेन के लिए लगातार जोखिम पैदा कर रही है। यह स्थिति बताती है कि कीमतों में यह मामूली उछाल ज़्यादा बड़ी इन्फ्लेशन का संकेत हो सकता है, अगर किसान प्रोडक्शन कम करते हैं और जियोपॉलिटिकल मसले जारी रहते हैं।

आगे क्या: लगातार जारी रहेगी इन्फ्लेशन

एनालिस्ट्स का मानना है कि वर्तमान स्थिति फूड आइटम्स के लिए लगातार इन्फ्लेशन का संकेत दे रही है। FAO भले ही 2025/26 में ग्लोबल सीरियल प्रोडक्शन में बढ़ोतरी का अनुमान लगा रहा है, लेकिन प्रोड्यूसर इकोनॉमिक्स कमजोर है। फर्टिलाइजर जैसे प्रमुख इनपुट्स की बढ़ती लागतें 2027 और उसके बाद की फसलों के लिए किसानों की प्लांटिंग योजनाओं को प्रभावित करेंगी। ग्लोबल ग्रेन मार्केट्स को बढ़ती लागतों के मुकाबले पतले मार्जिन और लगातार प्राइस प्रेशर का सामना करना पड़ रहा है। फार्म सेक्टर की इन बढ़ती लागतों और अप्रत्याशित वैश्विक घटनाओं से निपटने की क्षमता फूड सप्लाई की स्थिरता के लिए एक बड़ी परीक्षा होगी।

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