भारत के उर्वरक सेक्टर पर गहरा संकट मंडरा रहा है। वैश्विक सप्लाई चेन में आ रही दिक्कतों और मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष के कारण कच्चे माल की लागत आसमान छू रही है। अनुमान है कि वित्तीय वर्ष 2027 तक सरकार का उर्वरक सब्सिडी बिल **₹3.4 लाख करोड़** तक पहुंच सकता है, जो कि शुरुआती अनुमानों से दोगुना है। इस बढ़ी हुई लागत का सीधा असर Coromandel International जैसी बड़ी उर्वरक कंपनियों के मुनाफे पर पड़ रहा है। निवेशक सरकारी सब्सिडी बढ़ाने की उम्मीद कर रहे हैं ताकि उत्पादन लागत को संभाला जा सके।
आखिर क्यों बढ़ रही है सब्सिडी?
मध्य-पूर्व में चल रहे संघर्ष ने वैश्विक सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया है। इसके चलते अमोनिया और सल्फर जैसे ज़रूरी कच्चे माल की कीमतें रॉकेट की तरह बढ़ गई हैं। इसी वजह से, वित्तीय वर्ष 2027 के लिए सरकार की कुल उर्वरक सब्सिडी का बोझ ₹3.4 लाख करोड़ तक पहुँच जाने का अनुमान है। यह आंकड़ा शुरुआती बजट अनुमान ₹1.7 लाख करोड़ से दोगुना है। अगर ऐसा होता है, तो यह FY23 के रिकॉर्ड ₹2.5 लाख करोड़ को भी पार कर जाएगा।
कंपनियों के मुनाफे पर मार
इस बढ़ी हुई उत्पादन लागत के चलते सेक्टर की कंपनियां मुश्किल में हैं। भारत की जानी-मानी निजी उर्वरक निर्माता Coromandel International ने जून तिमाही में अपनी कमाई में 24% की गिरावट दर्ज की है। कंपनी का कहना है कि कच्चे माल की बढ़ती कीमतें सीधे तौर पर उनके प्रॉफिट मार्जिन को दबा रही हैं। कमाई में गिरावट के अलावा, उत्पादन की लागत बढ़ने से कंपनियों को ज्यादा वर्किंग कैपिटल की ज़रूरत पड़ रही है, जिससे उनके कैश फ्लो पर दबाव आ रहा है और रिटर्न रेशियो पर भी असर पड़ रहा है।
सब्सिडी की स्थिति और सेक्टर की चुनौतियां
सरकार ने खरीफ सीजन के लिए फॉस्फेटिक और पोटासिक उर्वरकों पर सब्सिडी तो बढ़ाई है, लेकिन इंडस्ट्री का मानना है कि यह अभी भी नाकाफी है। ज़रूरी कच्चे माल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और कंपनियां सारी बढ़ी हुई लागत किसानों पर नहीं डाल सकतीं, वरना मांग कम होने का डर है। एनालिस्ट्स का कहना है कि मौजूदा इनपुट कीमतों पर घरेलू उत्पादन करना कंपनियों के लिए मुश्किल होता जा रहा है, जिसका असर दूसरी तिमाही के नतीजों पर भी दिख सकता है।
आगे क्या देखना ज़रूरी?
निवेशकों के लिए सबसे बड़ी बात यह होगी कि क्या सरकार इस सेक्टर को सहारा देने के लिए सब्सिडी में कोई और बढ़ोतरी करती है। बाज़ार के जानकारों को सरकार की तरफ से मदद की उम्मीद तो है, लेकिन यह कब और कितनी होगी, यह कहना मुश्किल है। निवेशक कंपनियों के प्रोडक्शन वॉल्यूम पर भी नज़र रख सकते हैं, क्योंकि सप्लाई चेन की दिक्कतें अगर बनी रहीं तो देश में उर्वरक की कमी भी हो सकती है। साथ ही, ग्लोबल एनर्जी और केमिकल इनपुट की कीमतों में आने वाले उतार-चढ़ाव पर भी ध्यान देना होगा ताकि यह समझा जा सके कि प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव कब तक बना रहेगा।
