EU का नया नियम: भारत के लिए मेटल स्क्रैप इम्पोर्ट का संकट, बढ़ सकती है मैन्युफैक्चरिंग लागत

COMMODITIES
Whalesbook Logo
AuthorSaanvi Reddy|Published at:
EU का नया नियम: भारत के लिए मेटल स्क्रैप इम्पोर्ट का संकट, बढ़ सकती है मैन्युफैक्चरिंग लागत

यूरोपीय संघ (EU) के एक प्रस्तावित नए नियम से भारत के लिए नॉन-फेरस मेटल स्क्रैप का आयात जोखिम में पड़ गया है। चूंकि भारत अपनी जिंक, कॉपर और एल्युमीनियम स्क्रैप की **40%** तक जरूरतें इसी ब्लॉक से पूरी करता है, ऐसे में यह नियम घरेलू निर्माताओं की लागत में भारी उछाल ला सकता है।

यूरोपीय कमीशन का नया ड्राफ्ट रेगुलेशन भारत के मेटल रिसाइकलर्स और मैन्युफैक्चरर्स के लिए सप्लाई चेन का बड़ा सिरदर्द बन सकता है। 'वेस्ट शिपमेंट रेगुलेशन' के इस अपडेट में उन नॉन-OECD देशों की लिस्ट दी गई है जो नॉन-हजार्डस वेस्ट इम्पोर्ट कर सकते हैं। चिंता की बात यह है कि हालांकि इस लिस्ट में भारत का नाम है, लेकिन मेटल स्क्रैप इम्पोर्ट के लिए इसमें स्पेसिफिक ऑथराइजेशन गायब है। इस बड़ी चूक को सुधारने के लिए 'मटेरियल रिसाइकलिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया' (MRAI) ने केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय से तुरंत कूटनीतिक दखल की मांग की है।

क्यों है यह भारत के लिए चिंताजनक?

भारत के सेकेंडरी मेटल सेक्टर की यूरोपीय निर्यात पर निर्भरता बहुत अधिक है। ट्रेड डेटा के अनुसार, भारत अपने एल्युमीनियम स्क्रैप का लगभग 20%, कॉपर स्क्रैप का 22% और जिंक स्क्रैप का 40% हिस्सा यूरोपीय संघ से मंगाता है। घरेलू स्तर पर स्क्रैप कलेक्शन की कमी के कारण भारतीय कंपनियां (खासकर MSMEs) इन आयातित मटेरियल पर निर्भर हैं। यदि यह नियम लागू हो जाता है, तो कंपनियों को मजबूरी में 'वर्जिन मटेरियल' का इस्तेमाल करना पड़ेगा, जो काफी महंगे होते हैं और सीधा कंपनियों के नेट प्रॉफिट मार्जिन पर चोट करेंगे।

मुनाफा और मार्जिन पर असर

सेकेंडरी स्मेल्टर्स और फाउंड्रीज के लिए स्क्रैप और वर्जिन मेटल के बीच की कीमत का अंतर ही मुनाफे की असली चाबी है। वर्जिन मेटल की कीमतें 'लंदन मेटल एक्सचेंज' (LME) से जुड़ी होती हैं, जबकि रिसाइकल्ड स्क्रैप सस्ता विकल्प है। यदि सस्ता कच्चा माल मिलना बंद हुआ, तो मैन्युफैक्चरर्स की ऑपरेटिंग कॉस्ट में जबरदस्त उछाल आएगा। छोटी कंपनियों के लिए, जिनका मार्जिन पहले से कम है, इन बढ़ी हुई लागतों को झेलना मुश्किल होगा और उन्हें अंततः कीमतें बढ़ाकर ग्राहकों पर बोझ डालना पड़ सकता है।

आगे क्या होगा?

इस रेगुलेशन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वेस्ट का निपटान पर्यावरण के अनुकूल हो। फिलहाल, इस ड्राफ्ट पर पब्लिक कमेंट्स देने की आखिरी तारीख 16 अक्टूबर है। MRAI ने वाणिज्य मंत्रालय, स्टील मंत्रालय और खान मंत्रालय के साथ मिलकर इसे सुलझाने की कोशिश शुरू कर दी है। यदि मई 2027 तक यह नियम इसी रूप में लागू होता है, तो यह भारतीय उद्योगों के लिए कच्चे माल का एक बड़ा स्रोत बंद कर सकता है। निवेशकों को सरकार और यूरोपीय अधिकारियों के बीच होने वाली बातचीत पर नजर रखनी चाहिए क्योंकि इसका सीधा असर मेटल सेक्टर की कॉम्पिटिटिवनेस पर पड़ेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.