European Union ने 25 सितंबर, 2026 से Grain-Oriented Electrical Steel (GOES) के आयात पर नए कोटा और प्राइस फ्लोर लागू करने का फैसला लिया है। यह कदम सस्ते विदेशी स्टील को रोककर स्थानीय मैन्युफैक्चरर्स को मजबूती देने के लिए उठाया गया है।
यूरोपीय संघ (European Union) ने अपने घरेलू स्टील उद्योग को बचाने के लिए बड़ा कदम उठाया है। 25 सितंबर, 2026 से Grain-Oriented Electrical Steel (GOES) और उससे जुड़े प्रोडक्ट्स पर सख्त इंपोर्ट कोटा और मिनिमम प्राइस लागू होंगे। यूरोपीय आयोग (European Commission) ने यह फैसला मार्च में शुरू हुई एक सुरक्षा जांच (safeguard investigation) के बाद लिया है, जिसका मुख्य उद्देश्य एशियाई बाजारों से आने वाले सस्ते स्टील से स्थानीय कंपनियों को बचाना है।
नई प्राइसिंग और शर्तें
नए फ्रेमवर्क के तहत, कोटा के दायरे में आने वाले आयात के लिए कीमत €2,800 से €3,400 प्रति मीट्रिक टन तय की गई है। यदि आयात इस तय सीमा से ऊपर जाता है, तो उस पर €3,500 प्रति मीट्रिक टन का मिनिमम प्राइस लागू होगा। यह नियम ट्रांसफॉर्मर कोर और लेमिनेशन जैसे प्रोडक्ट्स पर भी लागू होंगे, जो विंड एनर्जी और इलेक्ट्रिकल ग्रिड के लिए बेहद जरूरी हैं।
भारतीय कंपनियों पर क्या होगा असर?
यह फैसला टाटा स्टील (Tata Steel) और जेएसडब्ल्यू स्टील (JSW Steel) जैसी भारतीय कंपनियों के लिए एक नई चुनौती है, जो यूरोप में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। हालांकि यह नियम मुख्य रूप से चीन से आने वाले सस्ते स्टील को टारगेट कर रहे हैं, लेकिन भारतीय निर्यातकों को अब यूरोप में अपना माल भेजने के लिए सख्त प्राइसिंग और वॉल्यूम प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा।
बर्लिन और ब्रसेल्स के इस फैसले से Thyssenkrupp और Stalprodukt SA जैसी यूरोपीय कंपनियों को तो राहत मिलेगी, लेकिन वैश्विक स्तर पर स्टील ट्रेड का समीकरण पूरी तरह बदल सकता है। निवेशकों की नजर अब इस बात पर है कि क्या ये अस्थायी उपाय आगे चलकर स्थायी सुरक्षा नियमों में बदलेंगे या नहीं।
