SEBI का बड़ा एक्शन! ETFs की कीमतों में हेरफेर पर कसेगा शिकंजा, निवेशकों को मिलेगी राहत?

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AuthorAditya Rao|Published at:
SEBI का बड़ा एक्शन! ETFs की कीमतों में हेरफेर पर कसेगा शिकंजा, निवेशकों को मिलेगी राहत?
Overview

SEBI भारत में Exchange Traded Funds (ETFs) की कीमतों में दिख रही विसंगतियों पर गंभीरता से गौर कर रहा है। खासकर Gold, Silver और International ETFs में, जहां इन फंड्स का मार्केट प्राइस और Net Asset Value (NAV) के बीच बड़ा अंतर देखा जा रहा है, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) इस पूरे ढांचे की समीक्षा कर रहा है।

SEBI की ETF प्राइसिंग पर पैनी नजर

हाल के कारोबारी सत्रों में, भारत में कई Exchange Traded Funds (ETFs) के मार्केट प्राइस और उनके इंडिकेटिव Net Asset Values (iNAVs) के बीच एक बड़ा और स्पष्ट अंतर देखा गया है। यह समस्या खासकर गोल्ड (Gold), सिल्वर (Silver) जैसी कमोडिटी (Commodity) और अंतरराष्ट्रीय इक्विटी (International Equity) पर केंद्रित ETFs में ज्यादा देखी जा रही है। इस बड़े प्राइस गैप के कारण निवेशक या तो ज्यादा कीमत पर खरीद सकते हैं या फिर डिस्काउंट पर बेचने को मजबूर हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, 23 फरवरी को Nippon India Silver ETF, अपने iNAV ₹253.72 के मुकाबले करीब ₹3.82 के डिस्काउंट पर बंद हुआ। वहीं, Baroda BNP Paribas Gold ETF अपने iNAV ₹149.18 के मुकाबले लगभग ₹3.07 के प्रीमियम पर ट्रेड करता दिखा। Groww Gold ETF में भी ऐसा ही डिस्काउंट देखा गया। यह स्थिति दर्शाती है कि निवेशकों की मजबूत मांग और सीमित लिक्विडिटी के चलते प्राइस डिस्कवरी (Price Discovery) के तरीके ठीक से काम नहीं कर पा रहे हैं। इसी को देखते हुए, बाजार नियामक SEBI ने ETF प्राइसिंग फ्रेमवर्क की व्यापक समीक्षा शुरू कर दी है और बेस प्राइस (Base Price) के निर्धारण व प्राइस बैंड (Price Band) को तर्कसंगत बनाने जैसे प्रस्तावों पर विचार कर रहा है।

कीमतों में अंतर के पीछे की वजहें

भारतीय ETFs में इस तरह की प्राइसिंग विसंगतियों के कई कारण हैं। इनमें निवेशकों की बढ़ती मांग, अंडरलाइंग एसेट्स (Underlying Assets) में सीमित लिक्विडिटी और अंतरराष्ट्रीय निवेश पर लगे रेगुलेटरी कैप (Regulatory Caps) शामिल हैं। गोल्ड और सिल्वर ETFs को बाजार की अनिश्चितताओं के बीच सुरक्षित निवेश (Safe Haven) माना जा रहा है, जिससे इनमें निवेशकों की रुचि काफी बढ़ी है। लेकिन, अक्सर यह मांग उपलब्ध लिक्विडिटी से कहीं ज्यादा हो जाती है, जिससे कीमतों में प्रीमियम (Premium) बढ़ जाता है। अंतरराष्ट्रीय ETFs के मामले में, विदेशी निवेश पर लगे नियमों का असर और बढ़ जाता है। भारत में, म्यूचुअल फंड्स (Mutual Funds) द्वारा विदेशी इक्विटी में कुल निवेश की सीमा 7 बिलियन डॉलर है, जिसमें ETFs के लिए 1 बिलियन डॉलर का विशेष कैप है। ये सीमाएं काफी समय पहले तय की गई थीं और बाजार की बढ़ती मांग के अनुरूप इनमें बढ़ोतरी नहीं हुई है। इसके कारण, ETF यूनिट्स की कृत्रिम कमी (Artificial Scarcity) पैदा हो जाती है, जिससे कीमतें iNAV से 20% से 40% तक ऊपर चली जाती हैं। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय ETFs के लिए टाइम ज़ोन (Time Zone) का अंतर भी एक समस्या है, जिससे iNAV जरूरी नहीं कि भारतीय बाजार खुलने के समय ग्लोबल मार्केट की वास्तविक चाल को दर्शाए। आर्बिट्रेज (Arbitrage) मैकेनिज्म की दक्षता भी ऐसे समय में कम हो जाती है जब बाजार में ज्यादा उतार-चढ़ाव हो या ऑथोराइज्ड पार्टिसिपेंट्स (Authorized Participants) को जल्दी से नई यूनिट्स बनाने में दिक्कत आए।

SEBI के प्रस्ताव: बेहतर मूल्य खोज और निवेशक सुरक्षा

बाजार की इन खामियों को दूर करने के लिए SEBI ने ETF प्राइसिंग फ्रेमवर्क में कुछ अहम बदलावों का प्रस्ताव दिया है। इसका मुख्य उद्देश्य बेहतर प्राइस डिस्कवरी और निवेशकों की सुरक्षा को बढ़ाना है। एक प्रमुख प्रस्ताव यह है कि प्राइस बैंड की गणना के लिए बेस प्राइस के निर्धारण का तरीका बदला जाए। अभी T-2 दिन के क्लोजिंग Net Asset Value (NAV) का इस्तेमाल होता है, जबकि नए प्रस्ताव के तहत T-1 दिन के क्लोजिंग ट्रेडेड प्राइस (T-1 Closing Traded Price), T-1 एवरेज इंडिकेटिव NAV (T-1 Average iNAV), या T-1 क्लोजिंग NAV (T-1 Closing NAV) को बेंचमार्क बनाया जा सकता है। इस बदलाव से खासकर तेजी से बदलते बाजारों में कीमतों के lag को कम किया जा सकेगा। SEBI ने यह भी चिंता जताई है कि ज्यादातर ETFs पर लागू ±20% का एक समान प्राइस बैंड शायद जरूरी नहीं है। अप्रैल से दिसंबर 2025 के आंकड़ों से पता चलता है कि 99% से ज्यादा इक्विटी (Equity) और डेट (Debt) ETFs की मूवमेंट 10% के भीतर रही, जबकि कमोडिटी ETFs 9% के भीतर रहे। SEBI का सुझाव है कि इन बैंड्स को तर्कसंगत बनाया जाए, कमोडिटी और इक्विटी/डेट ETFs के लिए शुरुआत में संकरे बैंड तय किए जाएं, हालांकि कुछ विशेष परिस्थितियों में छूट की अनुमति हो। इन प्रस्तावित बदलावों से ट्रेडिंग रेंज को अंडरलाइंग एसेट्स की अस्थिरता (Volatility) के अनुरूप ढाला जा सकेगा और प्राइसिंग विसंगतियों को कम किया जा सकेगा।

निवेशकों के लिए जोखिम: बाजार की अक्षमताएं

ETFs को इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि वे आर्बिट्रेज मैकेनिज्म के जरिए अंडरलाइंग एसेट्स को बारीकी से ट्रैक करें। लेकिन, मौजूदा बाजार माहौल में, यह निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण अक्षमताओं को उजागर करता है। सबसे बड़ा जोखिम यह है कि निवेशक बहुत ज्यादा कीमत चुका सकते हैं। उदाहरण के लिए, अंतरराष्ट्रीय ETFs का NAV से 20-40% प्रीमियम पर ट्रेड करना, यानी निवेशक वास्तव में काफी बढ़ी हुई कीमत पर एसेट्स खरीद रहे हैं, जो भविष्य के रिटर्न को कम कर सकता है। इसके विपरीत, किसी ETF को डिस्काउंट पर बेचने पर अनावश्यक नुकसान हो सकता है। कुछ अंडरलाइंग एसेट्स या niche ETFs की सीमित लिक्विडिटी इन समस्याओं को और बढ़ा सकती है, जिससे बड़े प्राइस इंपैक्ट (Price Impact) के बिना या वांछित वॉल्यूम (Volume) में ट्रेड करना मुश्किल हो जाता है। विदेशी निवेश पर रेगुलेटरी कैप, जिसका उद्देश्य विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) का प्रबंधन करना है, ने अनजाने में कृत्रिम कमी पैदा कर दी है, जिससे कीमतें बढ़ी हैं। इसके अलावा, iNAV पर निर्भरता, जिसमें अंतरराष्ट्रीय एसेट्स के लिए प्राइसिंग की जानकारी पुरानी हो सकती है, एक और जटिलता जोड़ती है। SEBI के प्रस्तावित बदलाव, हालांकि आशाजनक हैं, उन्हें पूरी तरह लागू होने में समय लग सकता है और ये प्रीमियम व डिस्काउंट को पूरी तरह खत्म नहीं कर पाएंगे, खासकर अस्थिर या illiquid सेगमेंट में। निवेशकों को सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि रेगुलेटरी प्रतिबंधों के हटने या बाजार की स्थितियों में बदलाव होने पर प्रीमियम तेजी से खत्म हो सकते हैं, जिससे कीमतों में अचानक बड़ी गिरावट आ सकती है।

भविष्य की राह: प्राइस अलाइनमेंट की ओर

SEBI द्वारा की जा रही यह समीक्षा, भारतीय ETF प्राइसिंग की संरचनात्मक समस्याओं को दूर करने के लिए एक सक्रिय दृष्टिकोण का संकेत देती है। T-1 बेंचमार्क की ओर बढ़ने और प्राइस बैंड को तर्कसंगत बनाने के प्रस्तावों से, नियामक बेहतर प्राइस डिस्कवरी को बढ़ावा देना और बाजार की अक्षमताओं को कम करना चाहता है। यदि ये बदलाव लागू होते हैं, तो ETF मार्केट प्राइस को उनके अंडरलाइंग वैल्यू के करीब लाने में मदद मिलेगी, जिससे निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा और लेनदेन लागत (Transaction Costs) कम हो सकती है। हालांकि गोल्ड और सिल्वर ETF बाजारों ने रिकॉर्ड इनफ्लो (Inflows) और मजबूत निवेशक भागीदारी देखी है, वर्तमान प्रीमियम नियामक समायोजनों की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं ताकि दीर्घकालिक स्थिरता और निवेशक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। नियामकों, बाजार सहभागियों और जनता के बीच चल रही बातचीत भारत में एक अधिक कुशल और पारदर्शी ETF इकोसिस्टम को आकार देने में महत्वपूर्ण होगी।

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