एक नए सर्वे में खुलासा हुआ है कि 53% पेट्रोल गाड़ी मालिकों को E20 फ्यूल से दिक्कतें आ रही हैं। माइलेज में भारी गिरावट और रिपेयरिंग का खर्च बढ़ना मुख्य वजहें हैं। खासकर 2023 से पहले के मॉडल वाले मालिकों को गाड़ी अपग्रेड कराने का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ सकता है। सरकार तेल आयात घटाने के लिए इथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ा रही है, लेकिन ग्राहकों को गाड़ी के परफॉरमेंस और रखरखाव को लेकर चिंताएं सता रही हैं।
E20 पेट्रोल: ग्राहकों की बढ़ती मुश्किलें
E20 पेट्रोल, जिसमें 20% इथेनॉल मिला होता है, भारतीय ग्राहकों के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है। लोकलसर्कल्स (LocalCircles) द्वारा किए गए एक सर्वे में 22,567 लोगों ने हिस्सा लिया, जिसमें 316 जिलों को कवर किया गया। चौंकाने वाली बात यह है कि आधे से ज़्यादा लोगों ने इस नए फ्यूल मिक्स के साथ अपने बुरे अनुभव बताए हैं। यह दिखाता है कि ग्राहकों को गाड़ी चलाने और उसका रखरखाव करने में काफी परेशानी आ रही है।
माइलेज में गिरावट और रिपेयर का बढ़ता खर्च
ग्राहकों की सबसे बड़ी चिंता गाड़ी की माइलेज में आई कमी है। सर्वे के अनुसार, 2023 से पहले बनी गाड़ियों के 66% मालिकों ने E20 फ्यूल इस्तेमाल करने के बाद माइलेज में 10% से ज़्यादा की गिरावट दर्ज की है। इतना ही नहीं, 45% लोगों ने यह भी बताया कि उनकी गाड़ी के पुर्ज़े तेज़ी से घिस रहे हैं, जिसकी वजह से मरम्मत का खर्च भी बढ़ गया है। ये नतीजे सरकारी दावों से बिल्कुल अलग हैं, जिनमें कहा गया था कि माइलेज पर ज़्यादा असर नहीं पड़ेगा।
पुराने वाहन मालिकों पर आर्थिक बोझ
इथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ाने का मामला सिर्फ परफॉरमेंस का नहीं, बल्कि सीधे-सीधे जेब पर पड़ने वाले बोझ का भी है। पुरानी गाड़ियों को E20 फ्यूल के अनुकूल बनाने के लिए ₹5,000 (दोपहिया वाहनों के लिए) से लेकर ₹10,000 (कारों के लिए) तक का खर्च आ सकता है। जिन घरों में पुरानी गाड़ियां हैं, उनके लिए यह अचानक आया खर्च उनकी कुल वाहन लागत को बढ़ा सकता है। सर्वे में 31% लोगों ने कहा कि अगर उन्हें E0 या E10 फ्यूल में थोड़ी ज़्यादा कीमत चुकानी पड़े, लेकिन माइलेज और परफॉरमेंस में कोई दिक्कत न आए, तो वे उसे चुनना पसंद करेंगे।
सरकारी दावों और जमीनी हकीकत में अंतर
सरकार का लक्ष्य इथेनॉल ब्लेंडिंग के ज़रिए किसानों की आय बढ़ाना और तेल के आयात पर निर्भरता कम करना है। लेकिन, ग्राहकों के अनुभव बताते हैं कि इस योजना को लागू करने में अभी भी बड़ी चुनौतियां हैं। सरकार अब अप्रैल 2026 से हाई-ऑक्टेन E20 फ्यूल (RON 95) लाने की भी तैयारी कर रही है।
नीति निर्माताओं के लिए बड़ी चुनौती
बड़े आर्थिक लक्ष्यों और आम ग्राहक के अनुभवों के बीच का यह अंतर नीति निर्माताओं के लिए एक मुश्किल पहेली है। सरकार पर्यावरण और ऊर्जा सुरक्षा के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए इथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ाने पर जोर दे रही है। हालांकि, सर्वे यह दिखाता है कि पुरानी गाड़ियों के रख-रखाव और उनकी लंबी उम्र को ध्यान में रखते हुए एक संतुलित रणनीति की ज़रूरत है। निवेशकों और संबंधित पक्षों को इस बात पर नज़र रखनी चाहिए कि सरकार इन चिंताओं को कैसे दूर करती है। क्या सरकार पुरानी गाड़ियों के लिए E0 या E10 फ्यूल की उपलब्धता सुनिश्चित करेगी, या फिर भविष्य की नीतियां मौजूदा E20 को लेकर आने वाली परफॉरमेंस की दिक्कतों को दूर करने पर केंद्रित होंगी।
