नेपाल से रिफाइंड खाद्य तेल का आयात 2023 के बाद से 17 गुना बढ़कर 2025 में **804,000 टन** तक पहुँच गया है। भारतीय रिफाइनरों का दावा है कि इस ड्यूटी-फ्री आयात से बाज़ार में असमानता पैदा हो रही है, जो घरेलू रिफाइनिंग मार्जिन और तेल बीज उत्पादक किसानों की कमाई पर असर डाल सकती है। उद्योग अब स्थानीय वैल्यू एडिशन को बचाने के लिए व्यापार समझौतों की समीक्षा की मांग कर रहा है।
Detailed Coverage
भारत के खाद्य तेल उद्योग पर दबाव
नेपाल से रिफाइंड खाद्य तेलों के आयात में अचानक आई भारी तेजी के चलते भारत का खाद्य तेल उद्योग बड़ी मुश्किल में पड़ गया है। आंकड़ों के अनुसार, 2025 में यह आयात बढ़कर 804,000 टन हो गया, जो 2023 के 47,295 टन के मुकाबले 17 गुना ज़्यादा है। साल 2026 के पहले पांच महीनों में ही यह आयात 284,976 टन तक पहुँच चुका है, जिससे घरेलू रिफाइनिंग सेक्टर की चिंताएं बढ़ गई हैं।
घरेलू रिफाइनरों और टैक्स रेवेन्यू पर असर
दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र (SAFTA) समझौते के तहत, नेपाल से रिफाइंड खाद्य तेल भारत में रियायती शर्तों पर आते हैं, जिन पर अक्सर ज़ीरो या कम कस्टम ड्यूटी लगती है। यह उन 16.5% की स्टैंडर्ड इंपोर्ट ड्यूटी से बिल्कुल अलग है जो भारत कच्चे खाद्य तेलों पर और 35.75% रिफाइंड तेलों पर दूसरे देशों से वसूलता है। भारत के रिफाइनर, जो स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग के लिए कच्चा तेल आयात करते हैं, उनका तर्क है कि यह मूल्य अंतर उनके कारोबार को नुकसान पहुँचा रहा है। प्रोसेसरों के प्रॉफिट मार्जिन पर असर के अलावा, इस ड्यूटी-फ्री आयात के कारण सरकार को कस्टम ड्यूटी से होने वाले संभावित राजस्व में सालाना ₹2,000 करोड़ से ₹2,500 करोड़ का नुकसान हो रहा है।
स्थानीय किसानों और आत्मनिर्भरता लक्ष्यों पर खतरा
भारत अपनी सालाना 24-25 मिलियन टन खाद्य तेल की ज़रूरत का लगभग 40% खुद पैदा करता है। देश का औद्योगिक ढांचा आयातित कच्चे तेल की स्थानीय रिफाइनिंग पर आधारित है, जो रोज़गार और सहायक उद्योगों को बढ़ावा देता है। उद्योग विशेषज्ञों को चिंता है कि अगर घरेलू रिफाइनिंग गतिविधियां धीमी पड़ती हैं, तो सरसों और सोयाबीन जैसे स्थानीय तेल बीजों की मांग भी घट सकती है। इस बदलाव से मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों के किसानों की आय पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। यह स्थिति सरकार के घरेलू तेल बीज उत्पादन को बढ़ाने और वनस्पति तेल क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने के प्रयासों को जटिल बना सकती है।
सेक्टर का भविष्य और आगे क्या?
खाद्य तेल और FMCG सेक्टर की कंपनियों पर नज़र रखने वाले निवेशकों के लिए, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या सरकार इन चिंताओं को दूर करने के लिए व्यापार मूल नियमों (trade origin rules) या ड्यूटी ढांचे में कोई बदलाव करती है। Adani Wilmar, Patanjali Foods और विभिन्न क्षेत्रीय सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर जैसी घरेलू कंपनियां इस माहौल में काम कर रही हैं, लेकिन उनके मार्जिन अक्सर रिफाइंड तेलों की लैंडेड कॉस्ट और कच्चे तेल की कीमतों के प्रति संवेदनशील होते हैं। निवेशकों को व्यापार नीति समीक्षाओं से संबंधित सरकारी घोषणाओं पर नज़र रखनी चाहिए, क्योंकि ड्यूटी या सत्यापन नियमों में कोई भी बदलाव स्थानीय रिफाइनरों के लिए प्रतिस्पर्धी परिदृश्य को बदल सकता है। इसके अलावा, मासिक आयात डेटा की निगरानी यह निर्धारित करने के लिए आवश्यक होगी कि क्या बढ़ते रिफाइंड आयात का वर्तमान रुझान जारी रहता है या नियामक हस्तक्षेप का सामना करता है।
