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ईरान तनाव: डॉलर हुआ सुपर स्ट्रॉन्ग, सोना औंधे मुंह गिरा! फेड रेट हाइक की बढ़ी उम्मीद

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AuthorAditya Rao|Published at:
ईरान तनाव: डॉलर हुआ सुपर स्ट्रॉन्ग, सोना औंधे मुंह गिरा! फेड रेट हाइक की बढ़ी उम्मीद
Overview

ईरान के साथ बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tensions) ने अमेरिकी डॉलर को रिकॉर्ड मजबूती दी है, जिससे सोना (Gold) और चांदी (Silver) जैसी कीमती धातुओं की कीमतों में भारी गिरावट आई है।

भू-राजनीतिक तनाव ने बढ़ाई डॉलर की चमक, गिराए सोने-चांदी के दाम

गुरुवार, 2 अप्रैल 2026 को कीमती धातुओं के बाज़ार में बड़ी गिरावट देखने को मिली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान को लेकर दिए बयानों के बाद, जहां संघर्ष जारी रहने के संकेत मिले, वहीं अमेरिकी डॉलर इंडेक्स (DXY) में लगभग 0.5% की तेजी आई और यह 100.00 के पार निकल गया। इस मजबूत डॉलर ने सोने और चांदी पर भारी दबाव डाला। सोना करीब 3% लुढ़ककर $4,630 प्रति औंस के आसपास आ गया, जबकि चांदी 5.5% से ज़्यादा गिरकर $71 के करीब ट्रेड करने लगी।

इस घटनाक्रम का असर कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों पर भी दिखा, जहाँ ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स में करीब 5% की उछाल आई और यह $106 प्रति बैरल के पार चला गया। वहीं, WTI क्रूड भी 4% से ज़्यादा बढ़कर $104 पर पहुंच गया। तेल की कीमतों में यह तेजी महंगाई (inflation) की चिंताओं को और बढ़ाने वाली साबित हुई।

महंगाई की मार, फेडरल रिज़र्व पर रेट हाइक का दबाव

ईरान संकट का असर अब सीधे तौर पर अमेरिकी केंद्रीय बैंक, फेडरल रिज़र्व (Federal Reserve) की नीतियों पर पड़ता दिख रहा है। ऊर्जा बाज़ार में आई बाधाओं और लगातार बनी हुई महंगाई (sticky inflation) को देखते हुए, बाज़ार की उम्मीदें पूरी तरह बदल गई हैं। ट्रेडर्स अब 2026 के आखिर तक फेडरल रिज़र्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती (rate cut) के बजाय बढ़ोतरी (rate hike) की 52% तक की संभावना जता रहे हैं। यह एक बड़ा उलटफेर है, जिसने सोने-चांदी जैसे नॉन-यील्डिंग एसेट्स (non-yielding assets) को कम आकर्षक बना दिया है। निवेशक अब उन डॉलर एसेट्स की ओर बढ़ रहे हैं, जो ऊंची ब्याज दरों से फायदा उठा सकते हैं। मार्च में FOMC ने दरों में कोई बदलाव नहीं किया था, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं।

सुरक्षित निवेश पर दबाव, बाज़ार में मायूसी

आम तौर पर, जब डॉलर मजबूत होता है तो सोने-चांदी पर दबाव आता है। हालांकि, मौजूदा माहौल थोड़ा पेचीदा है क्योंकि डॉलर एक तरफ़ सुरक्षित निवेश (safe haven) है, तो दूसरी तरफ फेडरल रिज़र्व की नीतियों से प्रभावित होता है। जहां जियोपॉलिटिकल तनाव सोने के लिए अच्छा माना जाता है, वहीं मौजूदा दौर में महंगाई और ऊंची ब्याज दरों का डर इस पर हावी दिख रहा है। इसका असर बड़े बाज़ारों पर भी देखा गया, अमेरिकी स्टॉक फ्यूचर्स 0.9% से ज़्यादा गिरे, एशिया के प्रमुख सूचकांकों में बड़ी गिरावट आई और S&P 500 भी 2 अप्रैल 2026 को 1.02% नीचे बंद हुआ।

चांदी पर दबाव और भी ज़्यादा है क्योंकि यह कीमती धातु होने के साथ-साथ औद्योगिक कमोडिटी (industrial commodity) भी है। हालांकि लंबी अवधि की मांग बनी हुई है, लेकिन अल्पावधि में लिक्विडिटी और तकनीकी दिक्कतें इसे नीचे खींच रही हैं। चांदी $72.70 के महत्वपूर्ण सपोर्ट लेवल को तोड़ चुकी है, जो अल्पावधि में मंदी का संकेत है।

बड़े संस्थानों की राय बंटी, आगे अस्थिरता के आसार

इन सब मुश्किलों के बावजूद, सोना (Gold) को लेकर बड़े वित्तीय संस्थानों (institutional investors) की राय बंटी हुई है। गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) का अनुमान है कि 2026 के अंत तक सोना $5,400 तक जा सकता है, जबकि जेपी मॉर्गन (JPMorgan) और यूबीएस (UBS) इसे $6,300 और $6,200 तक जाते देख रहे हैं। इनकी राय केंद्रीय बैंकों की लगातार खरीदारी और अनिश्चितता पर आधारित है। यह दिखाता है कि बाज़ार इस पर बहस कर रहा है कि क्या महंगाई और जियोपॉलिटिकल जोखिम सोने को एक स्टोर ऑफ वैल्यू (store of value) के तौर पर ऊपर ले जाएंगे, या लगातार ऊंची ब्याज दरें इसकी राह रोकेंगी।

फिलहाल, कीमती धातुओं के लिए जोखिम ज़्यादा दिख रहा है। सुरक्षित निवेश की मांग और ऊंची ब्याज दरों की उम्मीदों से मजबूत हो रहा डॉलर, सोने-चांदी के लिए मुश्किल हालात पैदा कर रहा है। चांदी के लिए तो तकनीकी चार्ट भी मंदी का इशारा कर रहे हैं। फेडरल रिज़र्व के रेट हाइक की बढ़ती संभावना, नॉन-यील्डिंग एसेट्स के लिए बड़ी चुनौती है। यह लंबा जियोपॉलिटिकल संघर्ष सप्लाई में बाधा और महंगाई को बढ़ा सकता है, जिससे फेड पर मुश्किल फैसला लेने का दबाव होगा। यह सब सोने और चांदी को और परेशान कर सकता है।

लंबी अवधि के लिए सोना (Gold) का आउटलुक कई विश्लेषकों के लिए बुलिश (bullish) है, जो 2026 के अंत तक $5,000 से $6,600 तक की भविष्यवाणी कर रहे हैं। वे केंद्रीय बैंकों की खरीदारी, महंगाई और डॉलर की संभावित कमजोरी को इसका आधार मान रहे हैं। आने वाला समय निश्चित रूप से अस्थिरता भरा रहेगा, क्योंकि बाज़ार जियोपॉलिटिकल घटनाओं, केंद्रीय बैंकों की नीतियों और महंगाई के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करेगा।

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