ग्लोबल मार्केट में क्रूड ऑयल की कीमतें तो कम हो रही हैं, लेकिन इसके उलट तेल को लाने-ले जाने का शिपिंग खर्च रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। यह विसंगति भारतीय निवेशकों के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि इससे सरकारी तेल कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है और फ्यूल इन्फ्लेशन का खतरा बना रह सकता है।
ग्लोबल एनर्जी मार्केट में इन दिनों एक अजीब स्थिति देखने को मिल रही है। जहां कच्चे तेल की कीमतें घटकर $95 के आसपास आ गई हैं, वहीं रिफाइनरी तक तेल पहुंचाने का लॉजिस्टिक्स खर्च तेजी से बढ़ गया है। स्थिति यह है कि कुल कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू का 25% तक हिस्सा सिर्फ ट्रांजिट फीस में जा रहा है।
लॉजिस्टिक्स का संकट
मिडिल ईस्ट से एशिया के रूट पर एक सुपरटैंकर का रोजाना का खर्च $1.2 मिलियन से $1.4 मिलियन तक पहुंच गया है। इसकी मुख्य वजह सुपरटैंकरों की कमी है। इसके अलावा, 'डार्क फ्लीट' (Dark Fleet) पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के कारण करीब 15% बड़े जहाजों को लंबे और महंगे रास्तों से गुजरना पड़ रहा है। नए जहाज बनने में अभी सालों का समय लगेगा, इसलिए यह सप्लाई संकट जल्द खत्म होता नहीं दिख रहा।
इंडियन ऑयल कंपनियों पर असर
Indian Oil Corporation (IOC), Bharat Petroleum (BPCL) और Hindustan Petroleum (HPCL) के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। तेल की सस्ती कीमतों का फायदा अब शिपिंग बिल के कारण खत्म हो रहा है। अगर ये कंपनियां बढ़ा हुआ खर्च ग्राहकों पर नहीं डालती हैं, तो उनके नेट प्रॉफिट मार्जिन पर चोट पड़ सकती है।
वहीं, Reliance Industries जैसे प्राइवेट रिफाइनर्स 'क्रैक स्प्रेड' (Crack Spread) यानी डीजल और जेट फ्यूल की कीमतों के अंतर का फायदा उठाकर इस स्थिति को संभालने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, लॉन्ग टर्म में सेक्टर की प्रॉफिटेबिलिटी इस पर निर्भर करेगी कि शिपिंग की ये ऊंची दरें कब तक स्थिर होती हैं।
इकोनॉमी और इन्फ्लेशन का रिस्क
भारत के लिए यह स्थिति करंट अकाउंट डेफिसिट और रुपये की वैल्यू पर दबाव डाल सकती है। निवेशकों को अब इस पर नजर रखनी चाहिए कि कंपनियां किस तरह इन लॉजिस्टिक लागतों को मैनेज करती हैं। आने वाले समय में मैनेजमेंट की कमेंट्री यह तय करेगी कि यह महंगाई का दौर कब तक खिंच सकता है।
