22 जुलाई 2026 को ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude Oil) $91.51 प्रति बैरल तक चढ़ गया, जिसका मुख्य कारण मध्य-पूर्व में बढ़ता तनाव है। इसी के साथ, सोने की कीमतों ने भी दो हफ्तों का उच्च स्तर छुआ, क्योंकि निवेशकों ने सुरक्षित संपत्तियों (Safe-Haven Assets) की ओर रुख किया। अब बाज़ार की नज़रें अगले हफ़्ते होने वाली अमेरिकी फेडरल रिज़र्व (US Federal Reserve) की बैठक पर हैं, जहाँ से ब्याज दरों पर स्पष्टता मिलने की उम्मीद है।
Detailed Coverage
क्यों चढ़े कच्चे तेल के दाम?
22 जुलाई 2026 को वैश्विक कमोडिटी बाज़ारों में भू-राजनीतिक उथल-पुथल का असर साफ़ दिखा। ब्रेंट क्रूड ऑयल में 0.55% की तेज़ी आई और यह $91.51 प्रति बैरल पर पहुँच गया। वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड में भी 0.36% का उछाल देखा गया और यह $84.64 प्रति बैरल पर ट्रेड कर रहा था। इन कीमतों में बढ़त मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष की ख़बरों के बाद हुई है। ईरान पर हुए सैन्य हमलों और कुवैत द्वारा दर्ज की गई ड्रोन स्ट्राइक जैसी घटनाओं ने वैश्विक सप्लाई में संभावित बाधाओं को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।
सोने में आई तेज़ी, बनी 'सेफ-हेवन'
तेल की कीमतों में सप्लाई की चिंताओं के चलते तेज़ी आई, वहीं दूसरी ओर सोने की कीमतों में भी निवेशकों के सुरक्षित संपत्तियों की ओर जाने से उछाल आया। स्पॉट गोल्ड (Spot Gold) की कीमतें 0.9% बढ़कर $4,113.73 प्रति औंस पर पहुँच गईं, जो 10 जुलाई 2026 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। अमेरिका में अगस्त डिलीवरी वाले गोल्ड फ्यूचर्स (Gold Futures) में भी इसी तरह का रुझान देखा गया, जहाँ 1.1% की बढ़ोतरी के साथ यह $4,119.10 प्रति औंस पर बंद हुआ। चांदी की कीमत $58.83 प्रति औंस पर स्थिर रही, जबकि प्लैटिनम और पैलेडियम में मामूली बढ़त देखी गई।
फेडरल रिज़र्व की पॉलिसी पर सबकी नज़र
भारतीय निवेशकों के लिए, वैश्विक कमोडिटी की इन कीमतों का असर घरेलू महंगाई (Inflation) और ऊर्जा आयात (Energy Imports) की लागत पर पड़ता है। वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति के अलावा, अब सबका ध्यान अगले हफ़्ते होने वाली अमेरिकी फेडरल रिज़र्व (US Federal Reserve) की पॉलिसी मीटिंग पर है। फेड के ब्याज दरों पर फैसले वैश्विक बाज़ारों के लिए बहुत अहम होते हैं, क्योंकि ऊंची ब्याज दरें अक्सर अमेरिकी डॉलर को मज़बूत करती हैं, जिससे अन्य मुद्राओं का उपयोग करने वाले खरीदारों के लिए डॉलर-आधारित कमोडिटीज़ महंगी हो जाती हैं।
निवेशक अब इस बात पर नज़र रखे हुए हैं कि क्या फेड अपनी ब्याज दर की दिशा में कोई बदलाव का संकेत देगा, जिसका असर इक्विटी (Equity) और कमोडिटी (Commodity) दोनों वर्गों में निवेश की रणनीतियों पर पड़ेगा। कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव एक महत्वपूर्ण निगरानी योग्य कारक बना हुआ है, क्योंकि ऊर्जा की ऊंची लागत भारतीय कंपनियों के मुनाफ़े पर असर डाल सकती है, खासकर वे जो कच्चे तेल पर निर्भर हैं, जैसे कि पेंट, केमिकल और एविएशन सेक्टर की कंपनियां।
