ग्लोबल मार्केट में क्रूड ऑयल (Crude Oil) की कीमतों में इस हफ्ते नरमी देखने को मिली है। ब्रेंट क्रूड **$89** के आसपास कारोबार कर रहा है। ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के आकलन के बाद बाजार में आई यह गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक पॉजिटिव संकेत है, क्योंकि इससे इंपोर्ट बिल और महंगाई पर दबाव कम होने की उम्मीद है।
शुक्रवार के कारोबारी सत्र के दौरान ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई, जिससे पिछले दो हफ्तों से जारी तेजी पर ब्रेक लग गया है। ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स फिसलकर $89 प्रति बैरल के करीब आ गया है, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) फ्यूचर्स $83 के आसपास ट्रेड कर रहा है। दोनों ही बेंचमार्क में इस हफ्ते 4% से 5% तक की गिरावट देखी गई है, जो एनर्जी मार्केट के मूड में बड़े बदलाव का संकेत है।
कीमतें क्यों घट रही हैं?
कीमतों में इस नरमी की मुख्य वजह भू-राजनीतिक (Geopolitical) खबरों के प्रति ट्रेडर्स का नजरिया है। हालांकि अमेरिका ने ईरान पर नए प्रतिबंध लगाए हैं, लेकिन फिलहाल बाजार इसे फिजिकल सप्लाई में बाधा के बजाय एक आर्थिक कदम के रूप में देख रहा है। यही वजह है कि पिछले दो हफ्तों में हुई आक्रामक खरीदारी के बाद अब ट्रेडर्स थोड़ा पीछे हट रहे हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा?
भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा क्रूड ऑयल आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों का सीधा असर भारतीय रुपये और सरकारी इंपोर्ट बिल पर पड़ता है। जब ग्लोबल स्तर पर दाम कम होते हैं, तो यह घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए राहत की बात होती है, क्योंकि इससे महंगाई पर काबू रखने में मदद मिलती है।
शेयर बाजार की बात करें तो, इसका अलग-अलग कंपनियों पर अलग असर होता है। इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) जैसी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के लिए कच्चे तेल के दाम कम होना फायदेमंद है, क्योंकि इससे फ्यूल बनाने की लागत कम हो जाती है। इसके विपरीत, ONGC और ऑयल इंडिया जैसी अपस्ट्रीम कंपनियों के लिए कम दाम चिंता का विषय हो सकते हैं क्योंकि इससे उनकी प्रॉफिटेबिलिटी प्रभावित होती है।
भू-राजनीतिक जोखिम अभी भी बरकरार
गिरावट के बावजूद ग्लोबल तनाव के कारण बाजार अभी भी सतर्क है। पूर्वी यूरोप का संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण व्यापारिक रास्तों पर अस्थिरता चिंता का बड़ा कारण है। यदि किसी भी तरह का फिजिकल संघर्ष बढ़ता है, तो सप्लाई चेन में रुकावट आने से कीमतें फिर से तेजी से उछल सकती हैं। निवेशक अब इस बात पर नजर गड़ाए हुए हैं कि क्या यह गिरावट एक अस्थायी सुधार है या फिर आने वाले दिनों में यूरोप और मिडिल ईस्ट की स्थिति में बदलाव से एनर्जी के दाम फिर बढ़ेंगे।
