मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) का भाव **85 डॉलर** प्रति बैरल को पार कर गया है। इससे भारतीय शेयर बाजार में हाल ही में लौटी विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) की दिलचस्पी पर ब्रेक लग सकता है। तेल की ऊंची कीमतें भारत के ट्रेड डेफिसिट, रुपये की स्थिरता और महंगाई के लिए बड़े जोखिम पैदा कर सकती हैं।
कच्चे तेल में क्यों आई तेजी?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया है। मंगलवार को ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स (Brent Crude Futures) एक महीने के उच्चतम स्तर 85 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गए। यह तेजी मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनावों के दोबारा बढ़ने के कारण आई है। ऐसे समय में जब विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPIs) भारतीय शेयर बाजार में फिर से पैसा लगाने लगे थे, इस स्थिति ने बाजार की मजबूती को चुनौती दी है।
भारत की अर्थव्यवस्था पर असर
भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर देश की अर्थव्यवस्था पर सीधा पड़ता है। कच्चे तेल के दाम बढ़ने से आयात बिल बढ़ जाता है, जिससे देश का ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) चौड़ा हो सकता है और भारतीय रुपये पर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले दबाव आ सकता है। इसके अलावा, ईंधन की ऊंची कीमतों से महंगाई (Imported Inflation) भी बढ़ती है, जो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए घरेलू महंगाई को काबू में रखने की चुनौती को और बढ़ा देती है।
विश्लेषकों का कहना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें 90 डॉलर या 100 डॉलर प्रति बैरल की ओर बढ़ती हैं, तो यह विदेशी निवेशकों के सेंटिमेंट को कमजोर कर सकता है। ये निवेशक भारत की बाहरी आर्थिक सेहत का अंदाजा लगाने के लिए इन पैमानों पर बारीकी से नजर रखते हैं।
FPIs की सक्रियता और बाजार का मिजाज
जुलाई में FPIs ने भारतीय इक्विटी में 18,314 करोड़ रुपये का निवेश कर शुद्ध खरीदार बने थे। यह पिछले एक साल में बिकवाली के दौर के बाद एक महत्वपूर्ण बदलाव था। इस साल की शुरुआत से अब तक FPIs कुल 2,55,958 करोड़ रुपये से ज्यादा की बिकवाली कर चुके थे। जुलाई में उनकी खरीदारी को तेल की कीमतों में पहले आई 40% की गिरावट और दक्षिण कोरिया व ताइवान जैसे एशियाई बाजारों से पैसा निकालकर अन्य बाजारों में लगाने की वैश्विक फंडों की रणनीति का भी सहारा मिला था।
निवेशकों के लिए आगे क्या?
निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि क्या मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव के कारण ऊर्जा की ऊंची कीमतें लंबे समय तक बनी रहेंगी। हालांकि घरेलू बाजार की स्थिति अभी भी संस्थागत निवेशकों के लिए अहम है, लेकिन ब्रोकरेज फर्मों के विश्लेषकों का कहना है कि वैश्विक फंड संभावित कमाई में गिरावट (Earnings Downgrades) और रुपये में कमजोरी जैसे जोखिमों का भी आकलन कर रहे हैं।
निवेशक अब तेल की कीमतों की चाल, रुपये की स्थिरता और NSDL द्वारा जारी किए जाने वाले FPI फ्लो के आंकड़ों पर पैनी नजर रखेंगे। इससे यह तय करने में मदद मिलेगी कि जुलाई में देखी गई खरीदारी का यह रुझान, बदलते वैश्विक कमोडिटी माहौल के बावजूद, जारी रह पाएगा या नहीं।
