मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के चलते Brent Crude की कीमतें **$116** प्रति बैरल के स्तर को पार कर गई हैं। सऊदी अरब की रिफाइनरियों पर ड्रोन हमलों और ईरान को लेकर बढ़ती चिंताओं ने बाजार में हलचल मचा दी है, जिसका सीधा असर भारत के इंपोर्ट बिल और रुपये पर पड़ सकता है।
शुक्रवार को वैश्विक ऊर्जा बाजारों में मिडिल ईस्ट के घटनाक्रमों के कारण भारी उथल-पुथल देखी गई। Brent Crude के वायदा भाव 1% से ज्यादा बढ़कर $116.25 तक पहुंच गए हैं। घरेलू बाजारों में भी इसका असर साफ है, जहां MCX पर कच्चे तेल के वायदा 1.24% की तेजी के साथ ₹9829 पर कारोबार कर रहे हैं। अमेरिकी रक्षा अधिकारियों द्वारा ईरान को लेकर बनाई जा रही सैन्य रणनीतियों की खबरों ने निवेशकों में डर पैदा कर दिया है।
आपूर्ति पर मंडराया संकट
सऊदी अरब में रिफाइनरियों और इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाए जाने के बाद ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। हालांकि मिसाइलों को इंटरसेप्ट कर लिया गया, लेकिन मुख्य तेल उत्पादक क्षेत्रों में इस तरह के हमलों ने सप्लाई चेन को लेकर अनिश्चितता पैदा कर दी है, जिससे कीमतों में उछाल आ रहा है।
भारतीय निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
भारत अपनी 85% से अधिक कच्चे तेल की जरूरतें आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी से भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ेगा, जो रुपये पर दबाव डालेगा और करंट अकाउंट डेफिसिट को प्रभावित कर सकता है।
किन सेक्टरों पर नजर रखें?
- ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs): IOC, BPCL और HPCL जैसी कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है, यदि वे बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों पर नहीं डाल पाती हैं।
- अपस्ट्रीम कंपनियां: ONGC और Oil India को राजस्व में लाभ हो सकता है, लेकिन विंडफॉल टैक्स इस मुनाफे को सीमित कर सकता है।
- अन्य सेक्टर: पेंट, टायर और एविएशन सेक्टर के लिए कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें चुनौती हैं, क्योंकि इनके लिए कच्चा माल और फ्यूल काफी महंगा हो जाता है।
आने वाले दिनों में 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) के रास्ते तेल की आपूर्ति की स्थिरता और सरकार द्वारा ईंधन कीमतों पर लिए जाने वाले फैसले बाजार के लिए सबसे महत्वपूर्ण रहेंगे।
