वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में सोमवार को 5% से ज़्यादा की भारी गिरावट दर्ज की गई। अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई रोकने के फैसले के बाद यह गिरावट आई। OPEC+ की ओर से सितंबर से प्रतिदिन 188,000 बैरल उत्पादन बढ़ाने की घोषणा ने इस गिरावट को और तेज़ कर दिया।
मध्य पूर्व में तनाव कम होने से बाज़ारों में बड़ी गिरावट
सोमवार सुबह वैश्विक तेल बाज़ारों में बड़ी गिरावट देखी गई, क्योंकि मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव कम होता दिख रहा है। ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) और वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) दोनों के फ्यूचर्स 5% से ज़्यादा गिरे। यह गिरावट अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के उस बयान के बाद आई, जिसमें उन्होंने ईरान के खिलाफ नियोजित सैन्य हमलों को रोकने की घोषणा की थी। शांति वार्ता की संभावनाओं के बीच इस फैसले ने तेल की कीमतों में पहले से शामिल जोखिम प्रीमियम (Risk Premium) को काफ़ी हद तक कम कर दिया है।
भारतीय कमोडिटी बाज़ारों पर असर
इस वैश्विक गिरावट का असर भारत पर भी तुरंत दिखाई दिया। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर अगस्त डिलीवरी वाले कच्चे तेल के फ्यूचर्स में 6% से ज़्यादा की गिरावट आई। भारत अपनी ज़रूरत का एक बड़ा हिस्सा तेल आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में कमी भारतीय निवेशकों और अर्थव्यवस्था के लिए आम तौर पर अच्छी मानी जाती है। अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में लगातार कमी से देश के आयात बिल को नियंत्रित करने और ईंधन लागत पर महंगाई के दबाव को कम करने में मदद मिल सकती है।
सप्लाई और OPEC+ की रणनीति
ईरान से जुड़े तनाव में कमी जहाँ मुख्य वजह बनी, वहीं बाज़ार ने OPEC+ (ऑर्गेनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज़ और उसके सहयोगी देशों) की सप्लाई पॉलिसी में बदलाव पर भी प्रतिक्रिया दी। समूह ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि वह सितंबर से उत्पादन में प्रतिदिन 188,000 बैरल की वृद्धि करेगा। इस फैसले का उद्देश्य बाज़ार को संतुलित करना और गठबंधन के भीतर पहले के ओवरप्रोडक्शन (Overproduction) को संबोधित करना है। भू-राजनीतिक अस्थिरता में कमी और बाज़ार में अतिरिक्त सप्लाई की उम्मीदों के मिलने से कीमतों पर भारी दबाव बना।
ऊर्जा से जुड़े स्टॉक्स (Energy-related Stocks) या कमोडिटी डेरिवेटिव्स (Commodity Derivatives) पर नज़र रखने वाले निवेशक इस बात पर ध्यान दे सकते हैं कि ये मूल्य उतार-चढ़ाव कैसे डाउनस्ट्रीम कंपनियों, जैसे ऑयल मार्केटिंग फर्मों और पेट्रोकेमिकल उत्पादकों के मुनाफ़े को प्रभावित करते हैं। हालाँकि कच्चे तेल की कम लागत से आमतौर पर ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के मार्जिन को समर्थन मिलता है, लेकिन यह ऊर्जा फर्मों के इन्वेंटरी वैल्यूएशन (Inventory Valuation) को भी प्रभावित कर सकता है। बाज़ार शांति वार्ता से संबंधित किसी भी नए अपडेट पर नज़र रखेगा, क्योंकि राजनयिक प्रयासों में कोई भी बदलाव सप्लाई की संभावनाओं को जल्दी से बदल सकता है और वैश्विक कमोडिटी बाज़ारों में नई अस्थिरता ला सकता है।
