मिडिल ईस्ट में बढ़ते संघर्ष और समुद्री मार्गों पर खतरे के चलते Brent crude की कीमतें **$100** प्रति बैरल के पार निकल गई हैं। यह उछाल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महंगाई और बढ़ते इंपोर्ट बिल के रूप में बड़ा जोखिम पैदा कर रहा है।
ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है। Brent crude $108.68 और WTI $103.45 प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गया है। पिछले एक हफ्ते में ही कीमतों में 13% की तेजी देखी गई है। इसका मुख्य कारण मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव है, विशेष रूप से यमन के मोखा बंदरगाह पर कब्जे और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तनाव की स्थिति, जिससे सप्लाई चेन पर संकट गहरा गया है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में $100 से ऊपर तेल की कीमतें सीधे तौर पर हमारे इंपोर्ट बिल को बढ़ाती हैं, जिससे रुपये पर दबाव पड़ता है और करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ता है। इससे RBI की राह भी मुश्किल हो सकती है, क्योंकि बढ़ती फ्यूल कॉस्ट से रिटेल महंगाई बढ़ने का खतरा है, जिससे भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश कम हो जाती है।
किन सेक्टरों की बढ़ेगी टेंशन?
तेल की बढ़ती कीमतों का सीधा असर अलग-अलग सेक्टरों पर पड़ता है:
- एविएशन सेक्टर: IndiGo और SpiceJet जैसी कंपनियों के लिए ATF (एविएशन टर्बाइन फ्यूल) की लागत बढ़ेगी, जिससे उनके प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आएगा।
- पेंट और केमिकल: इन कंपनियों का कच्चा माल क्रूड डेरिवेटिव्स पर आधारित होता है, इसलिए लंबे समय तक तेल महंगा रहने से इनकी ऑपरेटिंग कॉस्ट बढ़ जाती है।
- OMCs (HPCL, BPCL, IOCL): इनका हाल मिला-जुला है; कीमतें बढ़ने पर इन्हें इन्वेंटरी गेन तो होता है, लेकिन अगर रिटेल कीमतें नहीं बढ़ाई गईं, तो इनकी प्रॉफिटेबिलिटी पर असर पड़ता है।
- अपस्ट्रीम कंपनियां (ONGC, Oil India): कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से इनके रियलाइजेशन में सुधार होता है, हालांकि यह सरकार की विंडफॉल टैक्स पॉलिसी पर निर्भर करता है।
ग्लोबल सप्लाई का गणित
इस रैली के पीछे सप्लाई की किल्लत एक बड़ा कारण है। OPEC ने आर्थिक अनिश्चितताओं के कारण 2026 के लिए ग्लोबल डिमांड ग्रोथ के अनुमान को लगातार पांचवें महीने घटाया है। आने वाले हफ्तों में निवेशकों की नजर मिडिल ईस्ट के शिपिंग रूट्स की सुरक्षा और अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते तनाव पर टिकी रहेगी।
