Copper Price Rally: अमेरिकी इम्पोर्ट में उछाल और टैरिफ की आशंका से सप्लाई टाइट, भाव 18% ऊपर

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Copper Price Rally: अमेरिकी इम्पोर्ट में उछाल और टैरिफ की आशंका से सप्लाई टाइट, भाव 18% ऊपर

इंडस्ट्रियल मेटल मार्केट में इस वक्त काफी हलचल है। कॉपर की कीमतों में साल 2026 में अब तक करीब 18% की जोरदार तेजी देखने को मिली है। इसके पीछे अमेरिका से रिकॉर्ड इम्पोर्ट और दुनिया भर में घटता स्टॉक बड़ा कारण है। ऐसा माना जा रहा है कि टैरिफ (शुल्क) की आशंका के चलते कंपनियां स्टॉक जमा कर रही हैं, जिससे कीमतों में यह उछाल आया है।

सप्लाई पर पड़ रहा दबाव

अमेरिका में नई ट्रेड टैरिफ लगने की आशंकाओं के बीच कंपनियां धड़ल्ले से कॉपर का स्टॉक जमा कर रही हैं। जुलाई 2026 में यह पिछले 12 सालों का सबसे बड़ा मासिक इम्पोर्ट रहा। इस वजह से दुनियाभर में कॉपर की सप्लाई टाइट हो गई है और कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं।

LME पर घटता स्टॉक

लंदन मेटल एक्सचेंज (LME) पर कॉपर और एल्यूमीनियम दोनों का स्टॉक लगातार कम हो रहा है। इस समय मार्केट में 'बैकवर्डेशन' की स्थिति बनी हुई है, जिसका मतलब है कि तुरंत डिलीवरी के लिए कॉपर की कीमत फ्यूचर डिलीवरी से ज्यादा है। यह इस बात का संकेत है कि बाजार को तत्काल मेटल की कमी का डर सता रहा है। अगस्त के आखिर में LME कॉपर स्टॉक में थोड़ी रिकवरी दिखी थी, लेकिन कुल मिलाकर सप्लाई अभी भी टाइट है और अगर डिमांड ऐसे ही बनी रही तो कीमतों में और उछाल आ सकता है।

भारतीय इंडस्ट्री और निवेशकों पर असर

भारत के निवेशकों के लिए यह स्थिति मिली-जुली है। जो कंपनियां प्राइमरी मेटल बनाती हैं, उनके लिए ग्लोबल कीमतों में बढ़ोतरी से रेवेन्यू और प्रॉफिट मार्जिन बढ़ सकता है।

लेकिन, ऑटो कंपोनेंट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, कंस्ट्रक्शन और केबल बनाने वाली कंपनियों के लिए यह अच्छी खबर नहीं है। इन डाउनस्ट्रीम इंडस्ट्रीज के लिए कॉपर जैसी कमोडिटी की बढ़ी हुई कीमतें सीधे इनपुट कॉस्ट बढ़ाएंगी। अगर ये कंपनियां इस बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों पर नहीं डाल पाती हैं, तो उनके प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आ सकता है। इसलिए निवेशकों को यह देखना होगा कि क्या इन कंपनियों के पास दाम बढ़ाने की ताकत है।

आगे का जोखिम और ट्रिगर्स

हालांकि, सप्लाई की कमी के चलते कीमतें बढ़ रही हैं, लेकिन भविष्य में कुछ जोखिम भी हैं। चीन, जो दुनिया का सबसे बड़ा इंडस्ट्रियल मेटल कंज्यूमर है, वहां की मैन्युफैक्चरिंग में किसी भी तरह की मंदी कीमतों पर भारी पड़ सकती है।

इसके अलावा, अमेरिका की टैरिफ पॉलिसी में कोई भी बड़ा फैसला मार्केट को प्रभावित करेगा। इसलिए, निवेशकों को ग्लोबल स्टॉक लेवल्स और सेंट्रल बैंकों की नीतियों पर नजर रखनी चाहिए, जो इंडस्ट्रियल डिमांड पर असर डाल सकती हैं। यह तेजी कितनी टिकाऊ रहेगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सप्लाई की कमी बनी रहती है या बढ़ी कीमतों के कारण ग्लोबल डिमांड कम होती है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.