मिडिल ईस्ट का वार, कॉपर पर असर
मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव के बढ़ने से कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में तेजी आई है। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर महंगाई का जबरदस्त दबाव बना है। इसी माहौल के चलते इंडस्ट्रियल कमोडिटीज (Industrial Commodities) जैसे कॉपर पर भारी बिकवाली देखी जा रही है, क्योंकि निवेशक सुरक्षित निवेश की ओर भाग रहे हैं। Global X Copper Miners ETF (COPX), जो इस सेक्टर की कंपनियों को ट्रैक करता है, भी बाजार की अनिश्चितता के बीच लगभग $77.90 पर कारोबार कर रहा है। एनर्जी की बढ़ती लागतें कॉपर माइनिंग को सीधे तौर पर प्रभावित कर रही हैं, जिससे उत्पादन खर्च बढ़ रहा है।
चीन की सुस्त डिमांड और सप्लाई की चिंता
हाल की भू-राजनीतिक घटनाओं ने आर्थिक मंदी की आशंकाओं को हवा दी है, जिसका सीधा असर मैन्युफैक्चरिंग और इंडस्ट्रियल डिमांड पर पड़ रहा है। कॉपर के फंडामेंटल को लेकर राय बंटी हुई है। दुनिया का सबसे बड़ा कॉपर कंज्यूमर चीन की डिमांड ग्रोथ 2025 में धीमी पड़ गई है, जो उसके ऐतिहासिक पैटर्न से बिल्कुल अलग है। इस सुस्ती के कारण ग्लोबल एक्सचेंजों पर कॉपर का स्टॉक बढ़ रहा है, जो नियर-टर्म में बाजार में अतिरिक्त सप्लाई का संकेत दे रहा है। हालांकि, आने वाले सालों में सप्लाई की कमी का अनुमान है। J.P. Morgan के एनालिस्ट्स का अनुमान है कि 2026 तक दुनिया भर में रिफाइंड कॉपर का 330,000 मीट्रिक टन का घाटा हो सकता है, और कीमतें औसतन $12,075 प्रति मीट्रिक टन के आसपास रह सकती हैं। यह बताता है कि मौजूदा कीमतों में गिरावट मैक्रो इकोनॉमिक चिंताओं के कारण ज्यादा है, न कि सप्लाई की असल कमी के कारण।
बड़े रिस्क: एनर्जी और इकोनॉमिक स्लोडाउन
फिलहाल बाजार में रिस्क और रिवॉर्ड का कॉम्प्लेक्स सिनेरियो बना हुआ है। एनर्जी की ऊंची कीमतें उत्पादन लागत पर लगातार दबाव बनाए हुए हैं, जिससे कुछ जगहों पर माइनिंग ऑपरेशन घाटे का सौदा बन सकते हैं। चीनी डिमांड में आई कमी भी एक बड़ा रिस्क है, अगर यह जल्द ठीक नहीं हुई तो सप्लाई सरप्लस और बढ़ सकता है। इसके अलावा, मजबूत अमेरिकी डॉलर और लगातार महंगाई की चिंताएं अमेरिका के फेडरल रिजर्व जैसे केंद्रीय बैंकों को ब्याज दरें ऊंची बनाए रखने पर मजबूर कर रही हैं। इससे वैश्विक आर्थिक गतिविधि और कमोडिटी डिमांड पर असर पड़ रहा है। एल्युमीनियम के विपरीत, जिस पर मिडिल ईस्ट संकट के कारण सीधे सप्लाई चेन की दिक्कतें आई हैं, कॉपर पर असर मुख्य रूप से एनर्जी कॉस्ट और व्यापक आर्थिक प्रभावों के जरिए अप्रत्यक्ष है। इससे कॉपर मंदी के डर से डिमांड घटने के प्रति ज्यादा संवेदनशील है। Global X Copper Miners ETF (COPX) का P/E रेश्यो 20.15 से 35.59 के बीच है, जो बताता है कि डिमांड घटने पर कमाई में गिरावट आने पर यह महंगा साबित हो सकता है।
लॉन्ग-टर्म पर बुलिश नजरिया
मौजूदा प्राइस प्रेशर के बावजूद, कई एनालिस्ट्स कॉपर को लेकर लॉन्ग-टर्म में बुलिश (Bullish) बने हुए हैं। ग्लोबल एनर्जी ट्रांजिशन, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स और AI डेटा सेंटर्स जैसी डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की ग्रोथ जैसी स्ट्रक्चरल डिमांड की वजह से मेटल की मांग मजबूत रहने की उम्मीद है। J.P. Morgan और Goldman Sachs जैसे ब्रोकरेज हाउस 2026 के लिए कॉपर की औसत कीमतें $9,800 प्रति मीट्रिक टन से $12,500 प्रति मीट्रिक टन के बीच रहने का अनुमान लगा रहे हैं। यह इस विश्वास को दर्शाता है कि सप्लाई की रुकावटें अंततः कीमतों को ऊपर ले जाएंगी। हालांकि, नियर-टर्म में उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना है। बाजार पर नजर रखने वाले लोग भू-राजनीतिक घटनाओं, एनर्जी की कीमतों और सबसे महत्वपूर्ण, चीनी इकोनॉमिक इंडिकेटर्स और इन्वेंटरी लेवल्स पर बारीकी से नजर रखेंगे।
