ग्लोबल कमोडिटी मार्केट में इन दिनों भारी हलचल है। फेडरल रिजर्व की बैठक के नतीजों से पहले ट्रेडर्स सतर्क हैं। मजबूत डॉलर और मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने कीमतों पर दबाव बना रखा है, जो भारतीय निवेशकों की जेब पर सीधा असर डाल सकता है।
बाजार की नजर फेड मिनट्स पर
इस हफ्ते पूरी दुनिया की नजरें Federal Open Market Committee (FOMC) की मीटिंग मिनट्स पर टिकी हैं। निवेशक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक का आगे का रुख क्या होगा। हालांकि अक्टूबर में रेट हाइक की उम्मीदें कम हुई हैं, लेकिन हाई इंटरेस्ट रेट्स कब तक बने रहेंगे, यह बड़ा सवाल बना हुआ है।
मजबूत डॉलर बना सिरदर्द
डॉलर इंडेक्स का 102 के स्तर के ऊपर बने रहना कमोडिटी सेक्टर के लिए बड़ी चुनौती है। चूंकि ज्यादातर कमोडिटीज की खरीद-बिक्री डॉलर में होती है, इसलिए डॉलर के मजबूत होने से ये चीजें अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के लिए महंगी हो गई हैं, जिससे डिमांड पर असर पड़ रहा है।
क्रूड ऑयल और मिडिल ईस्ट का रिस्क
मिडिल ईस्ट में अस्थिरता के कारण क्रूड ऑयल की कीमतों में 'रिस्क प्रीमियम' जुड़ गया है। भारतीय निवेशकों के लिए यह चिंता का विषय है, क्योंकि क्रूड की कीमतें बढ़ने से देश का इम्पोर्ट बिल बढ़ता है और इसका सीधा असर महंगाई और ट्रांसपोर्टेशन लागत पर पड़ता है।
तांबे (Copper) पर सप्लाई का खतरा
दुनिया के सबसे बड़े कॉपर उत्पादक देश, चिली में लेबर यूनियन्स ने कॉन्ट्रैक्ट प्रस्तावों को ठुकरा दिया है, जिससे हड़ताल की आशंका पैदा हो गई है। अगर सप्लाई में रुकावट आती है, तो मेटल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है। हालांकि चीन से आ रहे मैन्युफैक्चरिंग डेटा में सुधार के संकेत हैं, लेकिन डॉलर की मजबूती फिलहाल कीमतों को बहुत ज्यादा ऊपर नहीं जाने दे रही है।
