कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में ₹183.50 की कटौती हुई है, जिससे हॉस्पिटैलिटी और बिजनेस सेक्टर को बड़ी राहत मिली है। वहीं, सरकार ने पेट्रोल एक्सपोर्ट पर स्पेशल एक्साइज ड्यूटी बढ़ाकर ₹4 प्रति लीटर कर दी है, जिसका मकसद डोमेस्टिक फ्यूल सप्लाई को प्राथमिकता देना है।
क्या हुआ?
1 जुलाई, 2026 से कमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों की कीमत में ₹183.50 की कटौती की गई है। इसके बाद दिल्ली में 19-किलो वाले सिलेंडर की कीमत ₹3,113.50 से घटकर ₹2,930 हो गई है। इस साल की शुरुआत में कीमतों में कई बार बढ़ोतरी के बाद 2026 में यह पहली बार है जब कमर्शियल सिलेंडर की कीमत कम हुई है। घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है।
इसी के साथ, सरकार ने पेट्रोल एक्सपोर्ट पर स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (SAED) को ₹1.5 प्रति लीटर से बढ़ाकर ₹4 प्रति लीटर कर दिया है, जो 1 जुलाई से लागू होगा। यह एडजस्टमेंट विंडफॉल टैक्स की पीरियोडिक समीक्षा का हिस्सा है।
कारोबारियों को राहत
कमर्शियल एलपीजी की कीमतों में यह कमी हॉस्पिटैलिटी, रेस्टोरेंट और बेकरी जैसे सेक्टरों के लिए ऑपरेटिंग कॉस्ट को सीधे तौर पर कम करेगी, क्योंकि ये सेक्टर 19-किलो वाले सिलेंडर के बड़े उपभोक्ता हैं। इन बिजनेसेज के लिए फ्यूल एक महत्वपूर्ण वेरिएबल कॉस्ट है। हालांकि कीमतों में यह कमी मार्जिन के लिहाज से कुछ राहत जरूर देगी, लेकिन यह इस साल की शुरुआत में देखी गई अस्थिर और ऊंची कीमतों के दौर के बाद आई है, जिसने उनकी प्रॉफिटेबिलिटी पर दबाव डाला था।
पेट्रोल एक्सपोर्ट ड्यूटी का असर
पेट्रोल एक्सपोर्ट पर स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी में बढ़ोतरी एक रेगुलेटरी कदम है जिसका मकसद फ्यूल एक्सपोर्ट को हतोत्साहित करना और डोमेस्टिक मार्केट में पर्याप्त सप्लाई सुनिश्चित करना है। जब ग्लोबल ऑयल की कीमतें बढ़ती हैं, तो डोमेस्टिक रिफाइनरियों के लिए घरेलू स्तर पर बेचने के बजाय फ्यूल एक्सपोर्ट करना ज्यादा फायदेमंद हो सकता है।
यह टैक्स एक "विंडफॉल टैक्स" के तौर पर काम करता है, जो ऑयल कंपनियों द्वारा ग्लोबल प्राइस वोलेटिलिटी के दौरान एक्सपोर्ट से कमाए गए अतिरिक्त प्रॉफिट मार्जिन को कम करता है। Reliance Industries, ONGC और Oil India जैसी लिस्टेड ऑयल मार्केटिंग कंपनियों और अपस्ट्रीम प्रोड्यूसर्स के लिए, यह पॉलिसी एक्सपोर्ट प्रॉफिट पर एक कैप लगाती है। इन्वेस्टर्स आम तौर पर ऐसे टैक्स एडजस्टमेंट्स को उन कंपनियों के लिए नेगेटिव मानते हैं जिनका एक्सपोर्ट एक्सपोजर ज्यादा है।
सेक्टर और रेगुलेटरी कॉन्टेक्स्ट
भारतीय सरकार इन एक्सपोर्ट ड्यूटीज की नियमित रूप से समीक्षा करती है, आमतौर पर हर पखवाड़े या जरूरत के अनुसार, ताकि कच्चे तेल की कीमतों, रिफाइनिंग मार्जिन और डोमेस्टिक डिमांड के बीच संतुलन बनाए रखा जा सके। ये फैसले ग्लोबल जियोपॉलिटिकल इवेंट्स से काफी प्रभावित होते हैं जो इंटरनेशनल ऑयल इकोनॉमिक्स को असर डालते हैं।
क्योंकि रिफाइनिंग मार्जिन क्रूड ऑयल की कीमतों और पेट्रोल व डीजल जैसे प्रोडक्ट की कीमतों, दोनों के प्रति संवेदनशील होते हैं, इन टैक्स परिवर्तनों का प्रमुख भारतीय ऑयल और गैस कंपनियों के फाइनेंशियल परफॉर्मेंस पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है।
इन्वेस्टर्स को क्या ट्रैक करना चाहिए?
ऑयल और गैस सेक्टर में इन्वेस्टर्स को विंडफॉल टैक्स की अगली रेगुलेटरी समीक्षा पर नजर रखनी चाहिए। एक महत्वपूर्ण मॉनिटरेबल यह है कि क्या ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतें अस्थिर बनी रहती हैं, क्योंकि इससे आमतौर पर एक्सपोर्ट ड्यूटी में और एडजस्टमेंट ट्रिगर होते हैं। इसके अलावा, जबकि कमर्शियल एलपीजी की कम कीमत रेस्टोरेंट और होटल जैसे यूजर इंडस्ट्रीज के लिए पॉजिटिव है, इसका ऑयल प्रोड्यूसर्स और रिफाइनर्स की अर्निंग्स पर सीधा असर नहीं पड़ता है, जिनकी प्रॉफिटेबिलिटी ग्लोबल रिफाइनिंग मार्जिन और क्रूड ऑयल की कीमतों के प्रति अधिक संवेदनशील होती है।
