सोने की ओर क्यों बढ़ रहे हैं सेंट्रल बैंक?
सेंट्रल बैंकों का यह सोना खरीदना सिर्फ करेंसी में उतार-चढ़ाव से बचने के लिए नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल फाइनेंस की दुनिया में एक बड़े बदलाव का संकेत है। जैसे-जैसे देशों के बीच भू-राजनीतिक तनाव बढ़ रहा है, कई देश अपनी विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) में अमेरिकी डॉलर और अन्य प्रमुख मुद्राओं की हिस्सेदारी कम कर रहे हैं। इसके बजाय, वे ऐसी नॉन-सोवरेन एसेट्स में निवेश कर रहे हैं, जिन्हें फ्रीज या डीवैल्यू नहीं किया जा सकता। यह रणनीति कोल्ड वॉर के बाद से चली आ रही रिजर्व मैनेजमेंट की सोच को पूरी तरह बदल रही है।
संस्थागत निवेश का लॉजिक
चीन के पीपुल्स बैंक (People's Bank of China) और पोलैंड के नेशनल बैंक (National Bank of Poland) जैसे केंद्रीय बैंकों के हालिया खरीद पैटर्न से पता चलता है कि उनका मकसद लंबी अवधि के जोखिम को कम करना है। ये बैंक केवल शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन के लिए नहीं, बल्कि एक खंडित वैश्विक अर्थव्यवस्था में टिके रहने के लिए निवेश कर रहे हैं। ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि जब भी सेंट्रल बैंकों की सोने की खरीद वैश्विक मांग के 15% से ऊपर जाती है, तो सोने की कीमतों को एक मजबूत सपोर्ट मिलता है, जो ब्याज दरों में बढ़ोतरी के बावजूद बना रहता है। मौजूदा समय में, जब रियल इंटरेस्ट रेट ऊंचे हैं, तब भी सेंट्रल बैंकों की लगातार खरीद यह दर्शाती है कि वे यील्ड देने वाली संपत्तियों (Yield-bearing Assets) की तुलना में पूंजी की सुरक्षा को ज्यादा महत्व दे रहे हैं।
करेंसी रिजर्व के लिए स्ट्रक्चरल रिस्क?
इस ट्रेंड के आलोचकों का कहना है कि सोने पर यह बढ़ता फोकस अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक प्रणाली में घटते भरोसे का संकेत है। अगर प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाएं अपने सोने को वापस मंगाना या पारंपरिक कस्टडी नेटवर्क के बाहर रिजर्व बनाना जारी रखती हैं, तो स्थापित वित्तीय व्यवस्था में पूंजी की गति (Velocity of Capital) धीमी पड़ सकती है। यह उन देशों के लिए एक स्ट्रक्चरल रिस्क पैदा करता है जो विदेशी पूंजी पर बहुत अधिक निर्भर हैं। भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं के लिए चुनौती यह है कि वे सोने से मिलने वाली स्थिरता और बाजार में हस्तक्षेप के लिए जरूरी लिक्विड फॉरेक्स रिजर्व के बीच संतुलन कैसे बनाएं। सोने में ज्यादा निवेश करने का जोखिम यह है कि करेंसी के बड़े झटकों (Currency Shocks) को संभालने की फ्लेक्सिबिलिटी कम हो जाएगी, क्योंकि यह एक ऐसी कमोडिटी से जुड़ जाएगा जो खुद प्राइस स्विंग्स के अधीन है।
भविष्य का अनुमान और बाजार पर असर
ब्रोकरेज की राय है कि अगर सेंट्रल बैंकों की सोने की मांग इसी रफ्तार से जारी रहती है, तो यह संभावित मंदी के झटकों (Recessionary Shocks) के खिलाफ एक लगातार सपोर्ट का काम करेगा। मार्केट पार्टिसिपेंट्स, संप्रभु विश्वास (Sovereign Confidence) के एक प्रमुख संकेतक के रूप में वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (World Gold Council) की तिमाही रिपोर्टों पर बारीकी से नजर रख रहे हैं। हालांकि सोना डॉलर को प्राथमिक मीडियम ऑफ एक्सचेंज के रूप में विस्थापित नहीं करेगा, लेकिन 'बीमा पॉलिसी' के तौर पर इसकी उपयोगिता को मौजूदा बाजार में मजबूती से आंका जा रहा है। अगले फाइनेंशियल ईयर के लिए अनुमान यह है कि सोने का संचय जारी रहेगा, या शायद और तेज होगा, क्योंकि एक मल्टीपोलर वित्तीय प्रणाली की ओर बढ़ते हुए संप्रभु ऋण (Sovereign Debt) के लिए अधिक ठोस कोलेटरल की मांग बढ़ेगी।
