सीमेंट बनाने वाली कंपनियों के लिए पहला क्वार्टर (Q1 FY27) चुनौतीपूर्ण रहने वाला है। ईंधन, माल ढुलाई और पैकेजिंग की लागत बढ़ने से मुनाफा घट सकता है, भले ही डिमांड **7-8%** बढ़ी हो। ऐसे में यह देखना होगा कि कंपनियां बढ़ी कीमतों को ग्राहकों पर कितना डाल पाती हैं, खासकर ऐसे समय में जब डिमांड सीजनली कमजोर होती है।
इनपुट लागत का बढ़ता बोझ
भारत की सीमेंट कंपनियों को चालू फाइनेंशियल ईयर (FY27) के पहले क्वार्टर में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। कोयला (Coal) और पेट-कोक (Pet-coke) जैसी चीजों के दाम बढ़ने के साथ-साथ माल ढुलाई का खर्च भी आसमान छू रहा है। इन वजहों से कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर भारी दबाव पड़ने की आशंका है। एनालिस्ट्स का मानना है कि EBITDA (ब्याज, टैक्स, डेप्रिसिएशन और एमोर्टाइजेशन से पहले की कमाई) पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 12% से 15% तक गिर सकता है। कई कंपनियों के लिए यह 30% से 50% तक का नेट प्रॉफिट ड्रॉप भी हो सकता है।
ग्लोबल सप्लाई चेन का असर
पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण सप्लाई चेन में आई दिक्कतें लागत को और बढ़ा रही हैं। इन सब फैक्टर्स के चलते ऑपरेशनल खर्च में लगभग ₹200 से ₹250 प्रति टन का इजाफा होने का अनुमान है। अच्छी बात यह है कि इस दौरान सीमेंट की मांग में 7-8% की ईयर-ऑन-ईयर ग्रोथ देखी गई है। इसकी एक वजह यह भी है कि मॉनसून सामान्य से कम रहा, जिससे जून तक कंस्ट्रक्शन का काम जारी रहा। हालांकि, यह बढ़ी हुई डिमांड भी कंपनियों के मुनाफे को बचाने के लिए काफी नहीं मानी जा रही है।
कीमत बढ़ाने और लागत घटाने पर फोकस
प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ रहे दबाव को देखते हुए, सीमेंट इंडस्ट्री का ध्यान अब नई क्षमताएं (Capacity Expansion) बढ़ाने से हटकर कीमत बढ़ाने और लागत नियंत्रण पर आ गया है। कुछ बड़ी कंपनियों ने कीमतें बढ़ाने में सफलता पाई है, लेकिन यह बढ़ोतरी कितनी स्थिर रहेगी, यह कहना मुश्किल है। इंडस्ट्री के आंकड़ों से पता चलता है कि क्वार्टर की शुरुआत में कीमतों में जो बढ़ोतरी हुई थी, जून के अंत तक उसे कुछ हद तक वापस भी लेना पड़ा। वहीं, कुछ खास रीजनल मार्केट में कड़ी प्रतिस्पर्धा के चलते छोटी कंपनियां बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों पर डाल नहीं पा रही हैं।
सितंबर क्वार्टर का आउटलुक
निवेशकों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मुनाफा घटाने वाला यह दबाव अगले क्वार्टर में भी जारी रह सकता है। जुलाई-सितंबर का पीरियड भारत में सीमेंट इंडस्ट्री के लिए ऐतिहासिक रूप से सबसे कमजोर होता है, क्योंकि मॉनसून के कारण कंस्ट्रक्शन एक्टिविटी धीमी पड़ जाती है। ब्रोकरेज फर्मों की रिपोर्ट के मुताबिक, ईंधन की लागत में आई सबसे बड़ी तेजी का असर इसी क्वार्टर में कंपनियों के नतीजों में दिखाई दे सकता है। ऐसे में, यह देखना अहम होगा कि डिमांड के कम होने के बावजूद कंपनियां कीमतें कितनी स्थिर रख पाती हैं। हालांकि, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट जैसे लॉन्ग-टर्म डिमांड फैक्टर्स मजबूत बने हुए हैं, लेकिन इनपुट कॉस्ट के स्टेबल होने या सेक्टर में प्राइसिंग पावर के सुधरने तक कमाई में अस्थिरता बनी रह सकती है।
