ग्रीन पोर्टफोलियो के CIO, अनुज जैन (Anuj Jain) का मानना है कि दुनिया एक लंबे कमोडिटी सुपरसाइकिल (Commodity Supercycle) में प्रवेश कर रही है। एनर्जी ट्रांजिशन और ग्लोबल डिफेंस खर्च में बढ़ोतरी इसके पीछे के मुख्य कारण हैं। साथ ही, सरकारी नीतियों की वजह से डोमेस्टिक डिफेंस फर्म्स के पास अगले कई सालों के लिए रेवेन्यू पाइपलाइन तैयार है। जून तिमाही के नतीजों में जहां **8-10%** की मामूली ग्रोथ दिखी, वहीं रूरल कंजम्पशन और कैपिटल गुड्स डिमांड निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण रहेंगे।
कमोडिटी की डिमांड में तूफानी तेजी
ग्रीन पोर्टफोलियो (Green Portfolio) के चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफिसर (CIO) अनुज जैन (Anuj Jain) का कहना है कि बाजार लंबे समय तक चलने वाले कमोडिटी डिमांड बूम, जिसे सुपरसाइकिल कहते हैं, में कदम रख रहा है। इसके दो बड़े कारण हैं। पहला, दुनिया का क्लीन एनर्जी की ओर बढ़ना, जिससे कॉपर, लिथियम और निकेल जैसे मेटल्स की मांग बढ़ रही है। दूसरा, यूक्रेन और वेस्ट एशिया में भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions) के कारण दुनिया भर में डिफेंस पर खर्च लगातार बढ़ रहा है। जैन के मुताबिक, इन फैक्टर्स की वजह से पोर्टफोलियो में मेटल और माइनिंग स्टॉक्स को शामिल करना फायदेमंद हो सकता है।
डिफेंस सेक्टर: मल्टी-ईयर रेवेन्यू का पावरहाउस
जैन ने डिफेंस सेक्टर को लॉन्ग-टर्म निवेशकों के लिए एक खास अवसर बताया है। इसका सबसे बड़ा सपोर्टिंग फैक्टर भारतीय सरकार की वो पॉलिसी है, जिसके तहत डिफेंस प्रोक्योरमेंट बजट का लगभग 75% हिस्सा डोमेस्टिक कंपनियों के लिए आरक्षित है। इससे अगले 10 से 15 सालों तक रेवेन्यू का एक बड़ा और भरोसेमंद पाइपलाइन तैयार होता है।
ग्रीन पोर्टफोलियो की नजरें स्मॉल और मिड-कैप डिफेंस फर्म्स पर हैं। कई बड़ी कंपनियां जैसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स (Hindustan Aeronautics), भारत इलेक्ट्रॉनिक्स (Bharat Electronics) और भारत फोर्ज (Bharat Forge) के पास पहले से ही 5 से 7 साल के ऑर्डर बुक हैं। जैसे-जैसे यह सेक्टर और परिपक्व होगा, भारतीय डिफेंस उत्पादों के एक्सपोर्ट (Export) में भी बढ़ोतरी की उम्मीद है। हालांकि, इस सेक्टर का प्रदर्शन काफी हद तक सरकारी बजट आवंटन (Budget Allocation) और पॉलिसी एग्जीक्यूशन पर निर्भर करेगा।
जून तिमाही के नतीजे और मार्केट का हाल
जून तिमाही के नतीजों पर नजर डालें तो निफ्टी 50 (Nifty 50) की कंपनियों का प्रदर्शन औसत रहा, जिसमें साल-दर-साल 8 से 10% की प्रॉफिट ग्रोथ देखी गई। FMCG और ऑटो जैसे कंजम्पशन सेक्टर चमके, जिसका मुख्य कारण अच्छा मॉनसून और रूरल डिमांड में आई तेजी रही। इसके अलावा, कैपिटल गुड्स और रियल एस्टेट सेक्टर ने भी मजबूती दिखाई। कैपिटल गुड्स कंपनियों ने तो सालों में सबसे बड़े ऑर्डर बुक दर्ज किए, जबकि बढ़ी हुई मॉर्टगेज दरों (Mortgage Rates) ने हाउसिंग मार्केट को थोड़ा झटका दिया।
निवेशकों को यह भी ध्यान देना चाहिए कि केमिकल जैसे कुछ सेक्टर बेहतर कॉस्ट मैनेजमेंट और इन्वेंटरी गेन के कारण अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे, लेकिन जोखिम अभी भी बने हुए हैं। कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव (Volatile Crude Oil Prices) और बढ़ती फ्रेट कॉस्ट (Freight Costs) कई इंडस्ट्रीज के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बना रही हैं।
जोखिम और आगे का नज़रिया
कमोडिटी और डिफेंस पर सकारात्मक दृष्टिकोण के बावजूद, व्यापक बाजार (Broader Market) कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। हाई वैल्यूएशन (High Valuations), सेंट्रल बैंक की नीतियों को लेकर ग्लोबल अनिश्चितता और भू-राजनीतिक शोर-शराबा कंसोलिडेशन (Consolidation) का माहौल बना रहे हैं। भारत का 7% जीडीपी ग्रोथ (GDP Growth) का लक्ष्य हासिल होने योग्य माना जा रहा है, लेकिन यह स्थिर तेल कीमतों और लगातार अच्छे मॉनसून पर निर्भर करेगा।
निवेशक सितंबर तिमाही के नतीजों पर नजर रख सकते हैं, क्योंकि इनपुट कॉस्ट प्रेशर (Input Cost Pressures) में कमी आने की उम्मीद है। आने वाले महीनों में, कंपनियों द्वारा संभावित आर्थिक अस्थिरता के बीच मार्जिन का प्रबंधन कैसे किया जाता है, और जून तिमाही में देखी गई रूरल डिमांड की रिकवरी जारी रहती है या नहीं, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
