यह कहानी है उन Gold और Silver ETFs की, जिन्होंने पिछले साल निवेशकों को मालामाल किया। Gold ETFs में करीब 82% और Silver ETFs में लगभग 170% का ज़बरदस्त रिटर्न मिला। लेकिन अब इन ETFs को एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
दरअसल, बाज़ार में चल रही भारी उथल-पुथल (Extreme Volatility) और निवेशकों की रिकॉर्ड तोड़ भीड़ (Record Investor Inflows) के कारण इन ETFs के ऑपरेशनल खर्चे बढ़ गए हैं। सबसे बड़ा असर दिख रहा है 'ट्रैकिंग एरर' (Tracking Error) और 'टोटल एक्सपेंस रेश्यो' (TER) पर। इसका सीधा मतलब ये है कि ETF का रिटर्न, उस सोने या चांदी की कीमत से पिछड़ रहा है जिसे वो ट्रैक करने की कोशिश कर रहा है। फंड मैनेजर्स को अचानक पैसा निकालने (Redemption) और हेजिंग (Hedging) के खर्चे पूरे करने के लिए ज़्यादा कैश अपने पास रखना पड़ता है। ये कैश होल्डिंग्स कुछ कमाती नहीं, जिससे ETF की ओवरऑल परफॉरमेंस पर निगेटिव असर पड़ता है।
जनवरी 2026 में ही Gold ETFs में ₹24,039 करोड़ और Silver ETFs में ₹9,463 करोड़ का इनफ्लो आया। इससे कुल AUM ₹3 लाख करोड़ के पार चला गया। इतनी बड़ी रकम को मैनेज करना फंड मैनेजर्स के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। खासतौर पर Silver ETFs में तो कुछ दिनों में 30% तक की बड़ी उठापटक देखी गई है। हाल के दिनों में वोलेटिलिटी करीब 13-14% रही।
आम तौर पर Gold ETF का TER 0.50% से 0.80% के बीच होता है, जबकि Silver ETF का 0.40% से 0.56%। लेकिन अब ट्रैकिंग एरर बढ़ रहा है। पिछले एक साल में ICICI Prudential Gold ETF का ट्रैकिंग एरर -3.01% रहा, जबकि HDFC MF और Kotak Mahindra MF का -3.24% और -3.25% था। Silver ETFs में यह और भी ज़्यादा है। ICICI Pru Silver ETF का ट्रैकिंग डिफरेंस -7.91%, Kotak MF का -8.76% और HDFC MF का -9.77% दर्ज किया गया। आम तौर पर 0.3% से कम ट्रैकिंग एरर को अच्छा माना जाता है। Mirae Asset Gold ETF का एक्सपेंस रेश्यो 0.35% और ट्रैकिंग एरर 0.36% है।
सिर्फ बाज़ार की वोलेटिलिटी ही नहीं, बल्कि भारतीय बुलियन बाज़ार की कुछ अपनी कमियां भी इस समस्या को बढ़ा रही हैं। खासकर Silver के मामले में, फिजिकल सप्लाई की कमी और बढ़ी हुई लीज रेट्स (Lease Rates) के कारण स्पॉट और फ्यूचर प्राइस में बड़ा अंतर आ गया है। इससे ETF को अंडरलाइंग एसेट ट्रैक करने में दिक्कत हो रही है। कई बार तो Silver ETF ग्लोबल कीमतों से 5.5% तक प्रीमियम पर ट्रेड कर रहे थे। अक्टूबर 2025 में Nippon India Silver ETF करीब 5.5% ऊपर ट्रेड कर रहा था। सोने और चांदी के भाव का अनुपात (Gold-to-Silver Ratio) भी 15 साल के निचले स्तर 59 के करीब आ गया है, जो चांदी की बढ़ी हुई वोलेटिलिटी को दर्शाता है।
इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए, SEBI (Securities and Exchange Board of India) ने एक अहम कदम उठाया है। 1 अप्रैल 2026 से, Gold और Silver ETFs अब LBMA (London Bullion Market Association) बेंचमार्क की जगह भारतीय एक्सचेंजों द्वारा प्रकाशित स्पॉट प्राइस (Polled Spot Prices) के आधार पर वैल्यू किए जाएंगे। यह बदलाव घरेलू बाज़ार की असलियत से ETF वैल्यूएशन को जोड़ने और कीमतों के अंतर को कम करने के लिए किया गया है।
हालांकि, एक्सपर्ट्स 2026 में Gold और Silver की कीमतों को लेकर पॉजिटिव हैं। Gold की कीमत $5,500-$6,000 प्रति औंस और Silver की $180-$400 प्रति औंस तक जा सकती है। लेकिन, बढ़ती कीमतों और वोलेटिलिटी को देखते हुए, विश्लेषकों की सलाह है कि एकमुश्त (Lump-sum) निवेश के बजाय धीरे-धीरे (Staggered Investments) निवेश करना ज़्यादा समझदारी होगी। Silver ETFs में जो प्रीमियम दिख रहा है, उससे नए निवेशक असल वैल्यू से ज़्यादा कीमत चुका सकते हैं। साथ ही, फंड मैनेजर्स पर आने वाला ऑपरेशनल खर्च भी ETFs के लिए लो-कॉस्ट पैसिव ट्रैकिंग (Low-Cost Passive Tracking) के मूल सिद्धांत को चुनौती दे रहा है। SEBI का नया नियम पारदर्शिता बढ़ाएगा, लेकिन फंड मैनेजर्स के ऑपरेशनल खर्चे और वोलेटिलिटी से जुड़ी दिक्कतें अभी भी बनी रहेंगी। इसलिए, निवेशकों को एक्सपेंस रेश्यो, ट्रैकिंग कंसिस्टेंसी और लिक्विडिटी को ध्यान से देखना होगा। यह समझना ज़रूरी है कि हाई-वोलेटाइल कमोडिटी में पैसिव इन्वेस्टमेंट के लिए कभी-कभी एक्टिव मैनेजमेंट जितनी सतर्कता बरतनी पड़ती है।