US-ईरान के बीच चल रहे टकराव के बावजूद, Brent Crude ऑयल की कीमतें उम्मीद से ज़्यादा स्थिर बनी हुई हैं। कीमतें $126 के शिखर पर पहुँचने के बाद औसतन $101 पर रहीं, जबकि बाजार को $150 तक जाने की उम्मीद थी। US का बढ़ा प्रोडक्शन, चीन की घटती मांग और सप्लाई में हुए बदलावों ने कीमतों को तेज़ी से बढ़ने से रोका है।
$150 की भविष्यवाणी गलत साबित
पिछले पांच महीनों से अमेरिका और ईरान के बीच जारी जंग के बावजूद, ग्लोबल ऑयल मार्केट ने उम्मीद से ज़्यादा मज़बूती दिखाई है। शुरुआत में, बाज़ार के जानकारों का अनुमान था कि हॉरमुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से व्यापार बाधित होने के डर से कच्चे तेल की कीमतें $150 या $200 प्रति बैरल तक पहुँच सकती हैं। लेकिन, Brent Crude फ्यूचर्स केवल $126 के आसपास ही पहुँच पाए। फरवरी के अंत से जून के मध्य तक, जब तनाव अपने चरम पर था, कीमतें औसतन $101 प्रति बैरल रहीं और जुलाई की शुरुआत तक ये युद्ध-पूर्व स्तरों की ओर गिरने लगीं।
चीन की घटती मांग का असर
कीमतों को स्थिर रखने में एक बड़ा कारण चीन की मांग में आई भारी गिरावट है, जो दुनिया का सबसे बड़ा क्रूड इम्पोर्टर है। जून तक, चीन का क्रूड इम्पोर्ट पिछले लगभग एक दशक में सबसे निचले स्तर पर पहुँच गया। इसकी वजह ईंधन के एक्सपोर्ट में की गई कटौती, टैक्सी सेगमेंट में इलेक्ट्रिक व्हीकल्स की ओर बढ़ता रुझान और इंडस्ट्रियल पेट्रोकेमिकल एक्टिविटी में सुस्ती रही। एक बड़े बाज़ार में इस तरह की कम खपत ने सप्लाई की अनिश्चितता को स्वाभाविक रूप से नियंत्रित किया।
US का प्रोडक्शन और स्ट्रेटेजिक रिजर्व
सप्लाई की तरफ से भी कीमतों को स्थिर रखने में मदद मिली। अमेरिका ने अप्रैल तक रिकॉर्ड 1.393 करोड़ बैरल प्रतिदिन का प्रोडक्शन हासिल किया। इसके अलावा, मार्च में इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) की मदद से अमेरिका के स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) से तेल की एक साथ की गई निकासी ने बाज़ार को सप्लाई की तत्काल कमी से बचाने में अहम भूमिका निभाई। इन सामूहिक उपायों ने कीमतों में लगातार बढ़ोतरी को रोकने के लिए ज़रूरी फिजिकल सपोर्ट प्रदान किया।
सप्लाई रूट्स और ट्रेडिंग में बदलाव
ट्रेड रूट्स और भू-राजनीतिक प्रभाव ने भी ग्लोबल ऑयल सप्लाई को संतुलित करने में भूमिका निभाई। सऊदी अरब ने लाल सागर के यांबू पोर्ट (Yanbu port) से अपने शिपमेंट बढ़ा दिए, जिससे हॉरमुज़ जलडमरूमध्य से होने वाले अनियमित प्रवाह की भरपाई हो सकी। संघर्ष जारी रहने के बावजूद, बाज़ार में फिलहाल फिजिकल ऑयल की पर्याप्त सप्लाई मौजूद है। यूरोपियन बाज़ारों में, नॉर्थ सी फोर्टिस (North Sea Forties) जैसे प्रोडक्ट्स के फिजिकल क्रूड प्राइस डिफरेंशियल प्रीमियम से डिस्काउंट में बदल गए हैं, जो इस बात का संकेत है कि मौजूदा मांग को उपलब्ध सप्लाई से आसानी से पूरा किया जा रहा है।
ऊर्जा सेक्टर पर नज़र रखने वाले निवेशकों के लिए, भविष्य में संघर्ष की तीव्रता और हॉरमुज़ जलडमरूमध्य पर इसके प्रभाव पर नज़र रखना महत्वपूर्ण होगा, साथ ही US के प्रोडक्शन लेवल में होने वाले बदलावों पर भी ध्यान देना ज़रूरी है। इसके अलावा, चीन के कम इम्पोर्ट का ट्रेंड कितना टिकाऊ रहता है, यह भी एक अहम फैक्टर होगा, क्योंकि उनकी पेट्रोकेमिकल एक्टिविटी में किसी भी तरह की तेज़ी ग्लोबल सप्लाई और डिमांड के समीकरणों को बदल सकती है।
